मध्य-पूर्व संकट से बचाव के लिए लिए सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने आपस में संयुक्त समझौता किए हैं। इसका मकसद ईरान या किसी दूसरे देश के हमले पर एक दूसरे का बचाव करना। मक्का में शुक्रवार को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने इस संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है। और आए दिन ईरान सउदी असर पर ड्रोल हमला करता रहा है। ऐसे में इस तरह के हमले से बचाव के लिए सऊदी अरब ने ये समझौता किया है। वहीं दूसरी ओर तुर्किये ने भी इस समझौते में शामिल होने का फैसला किया है ताकि भविष्य में होने वाले किसी तरह के हमले से बचा जा सके।
समझौते के अनुसार यदि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होता है तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना, संभावित आक्रमण को रोकना तथा क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना बताया गया है। ये समझौता एक तरह से इन तीनों देशों के लिए एक शील्ड का काम करेगा।
संयुक्त बयान में समझौते के विस्तृत सैन्य दायित्वों का खुलासा नहीं किया गया। हालांकि तुर्किये के एक अधिकारी ने कहा कि यह पूरी तरह रक्षात्मक समझौता है और इसका उद्देश्य किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों के लिए इसमें शामिल होने का रास्ता खुला रहेगा और यह समझौता किसी मौजूदा द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्था का स्थान नहीं लेता। इस संरक्षात्म समझौते में शामिल देशों के सबसे ज्यादा बल पाकिस्तान से मिला है। क्योंकि पाकिस्तान एक न्यूक्लियर स्टेट है और उसके संगठन में शामिल होने से कोई छोटा-मोटा देश इन देशों पर हमला करने से पहले कई बार सोचने को मजबूर होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्ष, खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों तथा ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते खतरे ने सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। इन परिस्थितियों में तीनों देशों ने रक्षा सहयोग, सामूहिक सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय को और मजबूत करने का निर्णय लिया है। ऐसे में अब देखने वाली बात होगी कि अमेरिकी हमले के जवाब में क्या ईरान सऊदी अरब पर हमला करता है या नहीं?
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