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Simanchal Politics: सीमांचल क्षेत्र में AIMIM की चुनौती और महागठबंधन की दुविधा

On: October 23, 2025 1:39 AM
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Simanchal Politics: सीमांचल क्षेत्र में AIMIM की चुनौती और महागठबंधन की दुविधा
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Simanchal Politics: सीमांचल क्षेत्र, जिसमें मुख्य रूप से किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले शामिल हैं, राज्य की राजनीति का एक बहुत महत्वपूर्ण और संवेदनशील केंद्र बन गया है। यह क्षेत्र बिहार का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल (लगभग 40% से 70% आबादी) इलाका है, जहाँ विधानसभा की 24 सीटें हैं।

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परंपरागत रूप से, इस क्षेत्र को RJD और कांग्रेस वाले महागठबंधन का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। राजद का M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण यहाँ काफी हद तक सफल रहा है। लेकिन, 2020 के विधानसभा चुनावों ने इस सारे समीकरण को तहस-नहस कर दिया, जिसका मुख्य कारण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का उदय था।

Simanchal Politics: AIMIM का ‘सीमांचल मॉडल’

2020 के चुनावों में, AIMIM ने महागठबंधन, खासकर RJD, को सबसे तगड़ा झटका दिया। ओवैसी की पार्टी ने इस क्षेत्र में 5 सीटें (अमौर, बहादुरगंज, बायसी, कोचाधामन और जोकीहाट) जीतकर सभी को चौंका दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AIMIM ने ठीक उन्हीं सीटों पर महागठबंधन का खेल बिगाड़ा, जहाँ मुस्लिम वोटों के बंटवारे के कारण RJD या कांग्रेस के उम्मीदवार मामूली अंतर से हार गए।

AIMIM का मुख्य चुनावी मुद्दा “मुस्लिम नेतृत्व” और “प्रतिनिधित्व” का रहा है। ओवैसी और उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि RJD और कांग्रेस ने दशकों तक मुसलमानों को सिर्फ एक “वोट बैंक” समझा और उनके वास्तविक विकास, शिक्षा और सुरक्षा के लिए काम नहीं किया। AIMIM खुद को मुसलमानों की “अपनी आवाज” के तौर पर पेश करती है।

महागठबंधन की ‘वोट-कटवा’ दुविधा

महागठबंधन (Simanchal Politics) के लिए AIMIM एक “वोट-कटवा” पार्टी से कहीं ज़्यादा बड़ी चुनौती है। M-Y समीकरण में सेंध: RJD की पूरी राजनीति M-Y समीकरण पर टिकी है। AIMIM सीधे तौर पर ‘M’ (मुस्लिम) वोट बैंक में सेंध लगाती है। अगर मुस्लिम वोट बंट जाता है, तो RJD का कोर वोट बिखर जाता है, जिसका सीधा फायदा NDA को मिलता है।

2020 का सबक: 2020 में तेजस्वी यादव के बहुमत से चूकने का एक बड़ा कारण सीमांचल में हुआ यह नुकसान ही माना गया।

विधायकों का टूटना: हालाँकि 2022 में RJD ने AIMIM के 5 में से 4 विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया (सिर्फ अख्तरुल ईमान को छोड़कर), लेकिन इससे ज़मीनी स्तर पर मतदाताओं के बीच एक भ्रम और धोखे का भाव भी पैदा हुआ। 2025 चुनाव का वर्तमान परिदृश्य से 2025 के विधानसभा चुनाव में यह लड़ाई और भी जटिल हो गई है:

महागठबंधन का ‘स्नब’: इस बार AIMIM ने सक्रिय रूप से महागठबंधन (INDIA ब्लॉक) में शामिल होने की पेशकश की थी। ओवैसी ने RJD को गठबंधन का प्रस्ताव भेजा, लेकिन RJD नेतृत्व ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

नया ‘तीसरा मोर्चा’: महागठबंधन से “धोखा” मिलने के बाद, AIMIM ने बिहार में एक नया ‘तीसरा मोर्चा’ बना लिया है जिसे ‘ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायंस’ (GDA) नाम दिया गया है। इसमें AIMIM के साथ चंद्रशेखर आज़ाद की ‘आजाद समाज पार्टी’ और स्वामी प्रसाद मौर्य की ‘अपनी जनता पार्टी’ शामिल हैं।

AIMIM का विस्तार: इस बार AIMIM सिर्फ सीमांचल तक सीमित नहीं है। पार्टी ने 35 सीटों पर लड़ने का ऐलान किया है और अपनी 25 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी है, जिसमें सीमांचल के अलावा दरभंगा, सीवान और मुंगेर जैसे इलाके भी शामिल हैं।

वोटों का बहु-विभाजन: इस बार सीमांचल में मुस्लिम वोटों का सिर्फ दो-तरफा नहीं, बल्कि तीन या चार-तरफा बंटवारा देखने को मिल सकता है। एक तरफ RJD-कांग्रेस का महागठबंधन है, दूसरी तरफ NDA (JDU-BJP) है, तीसरी तरफ AIMIM का GDA है, और कुछ सीटों पर प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को और पेचीदा बना रही है।

कुल मिलाकर, सीमांचल का रण इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या मुस्लिम मतदाता “बीजेपी को हराने के लिए” एकजुट होकर महागठबंधन को वोट देते हैं, या फिर “अपनी आवाज और नेतृत्व के लिए” AIMIM के GDA गठबंधन को चुनते हैं।

 

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