लोकआस्था का महापर्व चैती छठ की आज से शुरुआत हो रही है। छठ पर्व को शुद्धता और संयम के साथ सूर्योपासना का महापर्व माना जाता है। यह पर्व यह कार्तिक छठ की तरह ही होता है लेकिन थोड़ा कम पैमाने पर मनाया जाता है।

देशभर में आज से नहाय-खाय के पावन अनुष्ठान के साथ लोकआस्था का महापर्व चैती छठ का आरंभ हो गया। यह पर्व भगवान सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा का अद्वितीय अवसर है, जो पूरे परिवार की सुख-समृद्धि, संतति की दीर्घायु और आरोग्य के लिए मनाया जाता है। इस पर्व में विशेष रूप से शुद्धता, संयम और तप का पालन किया जाता है।
आज से शुरू होने वाला चार दिवसीय यह अनुष्ठान व्रतियों के लिए आत्मशुद्धि और आस्था का प्रतीक बनता है। पहले दिन “नहाय-खाय” के साथ व्रतियों ने शुद्धता का संकल्प लिया और कद्दू-भात का प्रसाद ग्रहण किया। इसके बाद से सूर्योपासना के विभिन्न चरणों की शुरुआत हो गई है।
पहला दिन (नहाय-खाय व्रत से पर्व आरंभ)
इस दिन व्रति स्नान कर शुद्धता का संकल्प लेते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन कद्दू-भात का प्रसाद व्रति द्वारा श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है, जो इस पर्व का एक अहम हिस्सा है।
दूसरा दिन (खरना और 36 घंटे का निर्जला व्रत)
दूसरे दिन सोमवार को “खरना” का आयोजन होता है, जिसमें व्रति दिनभर उपवासी रहते हैं और संध्या बेला में ईख के रस, गुड़ की रसिया-खीर, पूड़ी, केला आदि का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इस दिन प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रति 36 घंटे का निर्जला व्रत प्रारंभ करते हैं।
तीसरा दिन (अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य)
तीसरे दिन मंगलवार को व्रति अस्ताचलगामी सूर्य (डूबते सूर्य) को अर्घ्य अर्पित करते हैं। सूर्यदेव की पूजा से व्रति के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है और यह दिन पूरे परिवार के लिए मंगलमयी होता है।
चौथा दिन (उगते सूर्य को अर्घ्य और व्रत का समापन)
चैती छठ के पर्व का अंतिम दिन बुधवार को उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। उगते सूर्य की पहली किरण को अर्घ्य देने के बाद व्रति अपना व्रत समाप्त करते हैं और पारण (व्रत खोलना) करते हैं। इस दिन छठी मैया से प्रार्थना की जाती है और परिवार की समृद्धि, सुख-शांति और स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
सात्विक आहार और संयमित जीवन
इस पर्व के दौरान सात्विक आहार का पालन किया जाता है। व्रतियों को किसी भी प्रकार के तामसिक या मांसाहारी भोजन से दूर रहना होता है। पर्व के दौरान शुद्धता और संयम का ध्यान रखा जाता है, और प्रसाद तैयार करने के लिए नए चूल्हे और नए अनाज का ही इस्तेमाल किया जाता है।
चैती छठ के कुछ आवश्यक नियम
तन और मन की शुद्धता बनाए रखें।
ब्रह्मचर्य का पालन करें।
सात्विक भोजन ग्रहण करें।
व्रति को जमीन पर सोना चाहिए।
व्रत के दौरान कोई गलती होने पर तुरंत माफी मांगें।
चैती छठ का पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह मानवता, त्याग और संयम का भी आह्वान करता है। यह पर्व समर्पण और भक्ति के माध्यम से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। व्रति इस अवसर पर सूर्यदेव और छठी मैया से अपने परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं, और पूरे हर्षोल्लास के साथ इस महापर्व का पालन करते हैं।
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