जहा एक ओर देश 21वीं सदी में चाँद और अंतरिक्ष की नई ऊंचाइयों को छूने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर झारखंड के कोडरमा जिले के गझण्डी पंचायत का झुमकगाढ़ा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।

यहां लगभग 35 से 40 परिवार झारखंड की आदिम जनजाति मुंडा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जो बीते करीब दो दशकों से अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे है।
मूलभूत सुविधाओं का अभावकोडरमा के झुमकगाढ़ा में विकास
झुमकगाढ़ा में आज भी सड़क, बिजली और साफ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गांव तक पहुंचने का कोई सुगम रास्ता नहीं है, जिससे यहां के लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है।
भीषण गर्मी के दिनों में पानी की समस्या विकराल रूप ले लेती है. ग्रामीणों को चुआ (छोटा गड्ढा खोदकर) से किसी तरह पानी निकालकर अपनी प्यास बुझानी पड़ती है।
पहचान है, लेकिन अधिकार नहीं
ग्रामीणों के पास आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड तो मौजूद हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें मतदान का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन हैरानी की बात यह है। जहां भारत में लगभग 81.35 करोड़ लोगों को चावल और गेंहू
राशन के तौर पर मिलता है। वही झुमकगाढ़ा गांव के लोगों के आज तक राशन कार्ड नहीं बन पाया है।
इस वजह से ये लोग सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
बीमारी बनती है मौत का कारण
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव यहां के लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। यदि कोई बीमार हो जाता है, तो उसे खटिया या कंधे पर उठाकर गझण्डी तक ले जाना पड़ता है।
कई बार रास्ते में ही मरीज दम तोड़ देते हैं। समय पर इलाज नही मिलने के कारण सर्पदंश जैसे मामलों में भी लोगों की मौत हो जाती है।
जंगल का डर और असुरक्षा
रात के समय जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है। ग्रामीण लगातार भय के साए में जीवन जीने को मजबूर हैं।
20 साल से इंतजार, नहीं पहुंची विकास की किरण
ग्रामीणों के अनुसार वे वर्ष 2002 से यहां रह रहे हैं, लेकिन आज तक कोई भी सरकारी अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं पहुँचा।
करीब दो दशकों से यह गाँव विकास की बाट जोह रहा है, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं।





