MMDR संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड में सियासत तेज हो गई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झामुमो-कांग्रेस और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर विधेयक को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि एमएमडीआर संशोधन के विरोध के नाम पर सरकार छात्रों के आंदोलन और भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।
प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य राज्यों का खनन राजस्व छीनना नहीं है। उनके अनुसार रॉयल्टी, डीएमएफ, एनएमईटी, नीलामी प्रीमियम और जीएसटी में राज्यों की हिस्सेदारी बनी रहेगी। उन्होंने दावा किया कि 2014-15 से 2024-25 के बीच राज्यों का खनिज राजस्व करीब 25,206 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,14,549 करोड़ रुपये हो गया।
मरांडी ने झारखंड की खनिज नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले छह वर्षों में राज्य में केवल चार खदानों की नीलामी हुई और इनमें से एक भी संचालन में नहीं आ सकी। इसके विपरीत उन्होंने ओडिशा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 35 खदानें चालू हुईं और करीब 87 हजार करोड़ रुपये का नीलामी प्रीमियम प्राप्त हुआ।
उन्होंने आरोप लगाया कि खनिज उत्पादन के मामले में भी झारखंड अपनी क्षमता का पर्याप्त उपयोग नहीं कर पा रहा है। उनके मुताबिक 2018-19 से 2024-25 के बीच ओडिशा में लौह अयस्क उत्पादन करीब 120 मिलियन टन से बढ़कर 180 मिलियन टन हुआ जबकि झारखंड में यह लगभग 23 मिलियन टन के आसपास बना रहा।
बाबूलाल मरांडी ने लौह अयस्क और कोयले पर राज्य सरकार की ओर से लगाए गए उपकर को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन का फ्लैट उपकर लगाया गया है जबकि छत्तीसगढ़ में यह 22.50 रुपये प्रति टन है। वहीं, उनके अनुसार कोयले पर उपकर 16 महीनों में 100 रुपये से बढ़ाकर 450 रुपये प्रति टन किया गया।
डीएमएफ को लेकर भी मरांडी ने राज्य सरकार से सवाल किया। उन्होंने कहा कि झारखंड में करीब 19 हजार करोड़ रुपये डीएमएफ के तहत जमा हैं जबकि पश्चिमी सिंहभूम में ही करीब 3,700 करोड़ रुपये जमा हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि खनन प्रभावित क्षेत्रों और ग्रामीणों के विकास में इस राशि का प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि लघु खनिज, बालू और पत्थर पर एमएमडीआर संशोधन का प्रभाव नहीं पड़ेगा और इन पर राज्यों का नियंत्रण पूर्ववत रहेगा। उन्होंने झामुमो-कांग्रेस के विरोध को राजनीतिक नाटक बताते हुए कहा कि संसद में चर्चा के दौरान उनके सांसदों की अनुपस्थिति भी उनके विरोध की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है।
मरांडी ने छात्रों के आंदोलन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जेपीएससी, जेएसएससी और सीजीएल से जुड़ी मांगों को लेकर छात्र लगातार आंदोलन कर रहे हैं और पारदर्शी भर्ती की मांग कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार छात्रों की मांगों पर जवाब देने के बजाय एमएमडीआर विधेयक को मुद्दा बनाकर जनता का ध्यान भटका रही है।
उन्होंने कहा कि छात्रों के मुख्यमंत्री आवास घेराव की घोषणा के बाद सरकार की ओर से बातचीत का न्योता दिया गया। मरांडी ने इसे सरकार की संवेदनशीलता के बजाय दबाव में सक्रिय होने की प्रवृत्ति बताया।
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