देवघर जिले के सारठ प्रखंड में स्थित कुकराहा दुर्गा मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। विंध्याचल की तर्ज पर होने वाली पूजा पद्धति और मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर होना इसे बेहद खास बनाता है। यह मंदिर सिर्फ कुकराहा ही नहीं, बल्कि आसपास के 23 गांवों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है, जहां पूरे क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है।
नदी से आई थी आवाज, गमछे में लपेटकर लाए थे प्रतिमा
इस्टेट परिवार के सदस्य सीतांशु शेखर सिंह के अनुसार, मंदिर की स्थापना का इतिहास काफी चमत्कारिक है। वर्षों पूर्व उनके पूर्वज लखन सिंह खेत में काम कर रहे थे, तभी नदी से आवाज आई “बचाओ, मैं दुर्गा देवी हूं।” जब उन्होंने नदी की तरफ देखा, तो पानी में कुछ बहता नजर आया और आवाज वहीं से आ रही थी। लखन सिंह ने उसे श्रद्धापूर्वक अपने गमछे में लपेटा और कुकराहा गांव ले आए। इसके बाद ग्रामीणों की सहमति से पहले उसे गोशाला में स्थापित कर तुरंत पूजा-अर्चना शुरू की गई।
1865 में बना था पहला मंदिर, 2016 में हुआ भव्य नवनिर्माण
इस्टेट परिवार के वंशजों ने बताया कि वर्ष 1865 में वंशराज सिंह ने यहां पूरे विधि-विधान से पहले मंदिर का निर्माण कराया था, जिसके बाद से यहां नियमित पूजा जारी है। समय के साथ आस्था का दायरा बढ़ा और वर्ष 2016 में इस स्थल पर एक भव्य नए मंदिर का निर्माण कराया गया। इस नव्य मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश स्थापित किया गया है। वर्तमान में इस्टेट परिवार के विक्रम कुमार सिंह मंदिर के संचालक के रूप में सारी व्यवस्थाएं संभाल रहे हैं।
नवरात्रि में उमड़ता है भक्तों का जनसैलाब
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में अलौकिक माहौल रहता है। माता के दर्शन और इस अनोखी पूजा परंपरा के साक्षी बनने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि मां दुर्गा के इस स्वरूप के दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।







