Contaminated Water: धनबाद के बलियापुर प्रखंड की घड़बड़ पंचायत में भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में पहल शुरू हुई है। इसके लिए केंद्रीयकृत जल उपचार संयंत्र और एकल वितरण केंद्र के संचालन के वास्ते सक्षम एजेंसी का चयन किया जाना है। प्रस्तावित व्यवस्था से घड़बड़ समेत छह गांवों के करीब 6 हजार लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है। हालांकि, ग्रामीणों को राहत तभी मिल सकेगी, जब संयंत्र नियमित रूप से संचालित होगा और सभी प्रभावित गांवों तक शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
Contaminated Water: भूजल के नमूनों में 36 प्रतिशत से अधिक में मिला फ्लोराइड
क्षेत्र में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर चिंता इसलिए भी गंभीर है, इसी वर्ष जून में वैज्ञानिक शोध पत्रिका ACS ES&T Water में प्रकाशित अध्ययन में भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा सामने आई थी। अध्ययन के दौरान क्षेत्र के 315 भूजल नमूनों की जांच की गई, जिनमें 36 प्रतिशत से अधिक नमूनों में फ्लोराइड का स्तर 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर की निर्धारित सीमा से ज्यादा पाया गया।
जांच में फ्लोराइड की मात्रा 0.02 से 16.2 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच दर्ज की गई, जबकि इसकी औसत मात्रा 1.68 मिलीग्राम प्रति लीटर रही। अध्ययन में घड़बड़, खरिकाबाद, कालाझोर, शिवपुर, कालीपुर और सिंपथार गांवों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, इन गांवों में घड़बड़ में फ्लोराइड प्रदूषण का सूचकांक सबसे अधिक पाया गया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पेयजल दिशानिर्देशों के अनुसार, फ्लोराइड की मार्गदर्शक सीमा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इस सीमा से अधिक फ्लोराइड वाले पानी का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है।
छह गांवों की करीब 6 हजार आबादी पेयजल संकट से प्रभावित
जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार, इन छह गांवों की कुल आबादी 5,982 थी। इनमें घड़बड़ की आबादी 2,171, खरिकाबाद की 1,239, कालीपुर की 813, शिवपुर की 806, सिंपथार की 640 और कालाझोर की 313 दर्ज की गई थी। हालांकि, ये आंकड़े वर्ष 2011 की जनगणना पर आधारित हैं, इसलिए वर्तमान आबादी इससे अलग हो सकती है।
ग्रामीणों के अनुसार, चापाकल से पानी भरने के कुछ समय बाद बाल्टी और अन्य बर्तनों में पीली परत जमने लगती है। इससे उन्हें पीने के पानी के साथ-साथ खाना बनाने में भी परेशानी होती है। पंचायत में आठ चापाकल लगाए जाने की जानकारी दी गई है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इनमें से अधिकांश खराब पड़े हैं।

हालांकि, पानी में पीली परत दिखाई देना अपने आप में फ्लोराइड की अधिक मात्रा का प्रमाण नहीं है। पानी में मौजूद अन्य खनिजों या अशुद्धियों के कारण भी ऐसा हो सकता है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए जलस्रोतों के नमूनों की प्रयोगशाला में जांच जरूरी है।
संयंत्र संचालन के लिए एजेंसी चयन की प्रक्रिया शुरू
जिला योजना शाखा की ओर से केंद्रीयकृत जल उपचार संयंत्र और एकल वितरण केंद्र के संचालन के लिए सक्षम एजेंसी के चयन को लेकर निविदा जारी की गई है। इसका उद्देश्य प्रभावित क्षेत्र के भूजल का उपचार कर ग्रामीणों तक पीने योग्य पानी पहुंचाना है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एजेंसी के अभाव में संयंत्र बंद पड़ा था, जिसके कारण नियमित जलापूर्ति प्रभावित हो रही थी। अब एजेंसी चयन की प्रक्रिया पूरी होने और संयंत्र के दोबारा संचालन में आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि ग्रामीणों को नियमित रूप से पेयजल कब से मिलने लगेगा।
इसके लिए संयंत्र की तकनीकी क्षमता, फ्लोराइड हटाने की प्रभावशीलता, रखरखाव और वितरण केंद्र तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही, उपचारित पानी की नियमित गुणवत्ता जांच और उसके परिणामों की निगरानी भी आवश्यक होगी, ताकि लोगों को सुरक्षित पेयजल मिल सके।
पहले भी सामने आ चुकी है फ्लोराइड की समस्या
घड़बड़ पंचायत में भूजल में फ्लोराइड की समस्या नई नहीं है। दिसंबर 2023 में प्रकाशित जल जीवन संवाद की एक रिपोर्ट में भी पंचायत के भूजल में फ्लोराइड प्रदूषण और पुरानी बहु-ग्रामीण जलापूर्ति योजना के क्रियान्वयन में आ रही समस्याओं का उल्लेख किया गया था।
बार-बार सामने आ रही इस समस्या के बावजूद ग्रामीणों को नियमित और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में उपचार संयंत्र का प्रभावी संचालन और वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करना जरूरी है, ताकि लोगों को दूषित या अनुपयुक्त जलस्रोतों पर निर्भर नहीं रहना पड़े।
Contaminated Water: लंबे समय तक फ्लोराइडयुक्त पानी पीने से स्वास्थ्य पर असर
फ्लोराइड की अधिक मात्रा वाले पानी का लंबे समय तक सेवन दांतों और हड्डियों को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण डेंटल फ्लोरोसिस और गंभीर मामलों में स्केलेटल फ्लोरोसिस जैसी समस्याएं विकसित हो सकती हैं। इनमें दांतों पर धब्बे पड़ना, हड्डियों में बदलाव, जोड़ों में जकड़न और चलने-फिरने में परेशानी जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति में इन समस्याओं की पुष्टि चिकित्सकीय जांच के बाद ही की जा सकती है।
इसलिए प्रभावित गांवों में केवल जलापूर्ति शुरू करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता भी जरूरी है। ग्रामीणों को जांच के आधार पर सुरक्षित घोषित जलस्रोतों से ही पीने का पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
Contaminated Water: योजना की सफलता नियमित जलापूर्ति पर निर्भर
घड़बड़ पंचायत में प्रस्तावित जल उपचार व्यवस्था छह गांवों के हजारों लोगों के लिए राहत की उम्मीद जगा रही है। लेकिन योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संयंत्र कब तक चालू होता है, फ्लोराइड हटाने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रहती है और सभी प्रभावित गांवों तक नियमित रूप से सुरक्षित पेयजल पहुंच पाता है या नहीं।
इसके साथ ही, खराब पड़े चापाकलों की स्थिति की समीक्षा, जलस्रोतों की नियमित प्रयोगशाला जांच और जलापूर्ति व्यवस्था की जवाबदेही तय करना भी जरूरी होगा। ग्रामीणों को लंबे समय से चली आ रही पेयजल समस्या से स्थायी राहत दिलाने के लिए योजना का समयबद्ध क्रियान्वयन और निरंतर निगरानी महत्वपूर्ण साबित होगी।
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