305 वर्षों का गौरवशाली इतिहास और अखंड चिराग की परंपरा
देवघर जिले के करौं प्रखंड क्षेत्र स्थित प्रसिद्ध डिंडाकोली दुर्गा मंदिर में पिछले 305 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। नवरात्र के दौरान यहां पूरे नौ दिनों तक अनवरत (अखंड) चिराग जलाने की अनूठी परंपरा है।
संथाल विद्रोह और मंदिर स्थापना का संकल्प
बुजुर्गों के अनुसार, शुरुआत में इस मंदिर में केवल नवपत्रिका की पूजा होती थी। मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को लेकर पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि संथाल विद्रोह के दौर में विद्रोहियों ने इस क्षेत्र पर हमले की योजना बनाई थी। इसकी सूचना मिलते ही भयभीत ग्रामीण मां के दरबार में पहुंचे और प्राण-रक्षा की गुहार लगाई। ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि यदि उनकी रक्षा हुई, तो वे गांव में भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर मां की प्रतिमा स्थापित करेंगे। मां की कृपा से विद्रोही गांव की सीमा से ही लौट गए और हमला टल गया। इस घटना के बाद से ही मंदिर में प्रतिमा स्थापित कर विधिवत पूजा शुरू की गई।
बाढ़ का चमत्कार और प्रतिमा की प्राप्ति
मंदिर से जुड़ी एक अन्य लोककथा के अनुसार, दशकों पहले गांव के श्रद्धालु नदी पार कर तालझारी में दुर्गा पूजा करने जाते थे। एक वर्ष मूसलाधार बारिश के कारण पूरा इलाका जलमग्न हो गया और मंदिर में स्थापित प्रतिमा, नवपत्रिका तथा कलश पानी के तेज बहाव में बह गए। संयोगवश वह प्रतिमा डिंडाकोली गांव के लोगों को सुरक्षित मिल गई। इसके बाद ग्रामीणों ने उस प्रतिमा को गांव में स्थापित कर नियमित पूजा-अर्चना शुरू कर दी।

दर्जनों गांवों की अटूट आस्था का केंद्र
पुजारी रामदेव सिंह ने बताया कि डिंडाकोली के अलावा सुनसुन डबरा, तारापुर, धमना, चिकिनिया, सिंहपुर, छींट डिंडाकोली, प्रतापपुर, सालतर, भेंडो, सियाटांड़, लकरछरा और भलगढ़ा समेत दर्जनों गांवों के श्रद्धालुओं की आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई है।
देवघर संवाददाता शुभम सिंह







