झारखंड की उपराजधानी दुमका में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की रोक के बावजूद कथित अवैध बालू खनन और परिवहन का मामला लगातार सामने आ रहा है। जिले के विभिन्न इलाकों में दिन के उजाले से लेकर रात के अंधेरे तक बालू उठाव और वाहनों के जरिए परिवहन किए जाने की शिकायतें मिल रही हैं। हालिया घटना ने प्रशासन और खनन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी कड़ी में दुमका जिले के शिकारीपाड़ा थाना क्षेत्र में रामपुर-रामगढ़ के पास बालू लदे दो हाइवा के पलटने की घटना सामने आई है। बताया जा रहा है कि दोनों हाइवा रानीश्वर थाना क्षेत्र से बालू लेकर पश्चिम बंगाल की ओर जा रहे थे। रामगढ़ पुल के समीप दोनों वाहनों के पलटने की सूचना है। हालांकि हादसे में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।
घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि एनजीटी के निर्देश के तहत बालू उठाव पर रोक है तो आखिर बालू लदे भारी वाहनों का परिचालन किस आधार पर हो रहा है। वाहनों के पास मौजूद चालान और परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।
दुमका के शिकारीपाड़ा क्षेत्र में अवैध बालू कारोबार को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि रोक के बावजूद बड़े पैमाने पर बालू का उठाव कर उसे पश्चिम बंगाल की ओर भेजा जा रहा है। वहीं कई मामलों में अवैध बालू लदे वाहनों के पकड़े जाने की कार्रवाई भी सामने आती रही है।
रानीश्वर क्षेत्र से भी प्रतिबंध के बावजूद कथित बालू उठाव और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में परिवहन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में शिकारीपाड़ा में दो हाइवा के पलटने की घटना ने पूरे बालू परिवहन नेटवर्क पर फिर से चर्चा तेज कर दी है।
सवाल यह है कि NGT की रोक के बावजूद बालू खनन और परिवहन का यह सिलसिला आखिर कैसे चल रहा है? क्या सड़कों पर चलने वाले बालू लदे वाहनों की नियमित जांच हो रही है? अगर वाहनों को चालान के आधार पर परिवहन की अनुमति मिल रही है, तो उन चालानों की वैधता और स्रोत की जांच कौन कर रहा है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन की निगरानी के बावजूद यदि रोजाना बड़ी संख्या में बालू लदे वाहन सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं, तो कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि किसी व्यक्ति, अधिकारी या विभाग की मिलीभगत अथवा संरक्षण के आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
बालू के अवैध खनन से सरकारी राजस्व को नुकसान के साथ-साथ नदियों के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरण पर भी गंभीर असर पड़ने की आशंका रहती है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती केवल अवैध परिवहन रोकने की नहीं बल्कि बालू के स्रोत से लेकर उसके अंतिम गंतव्य तक पूरे नेटवर्क की जांच करने की भी है।
अब देखना होगा कि दो हाइवा पलटने की इस घटना के बाद प्रशासन और खनन विभाग वाहनों के दस्तावेज, बालू के स्रोत और परिवहन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करता है या मामला महज सड़क हादसे तक सीमित रह जाता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के मानसून दिशानिर्देशों के तहत हर साल नदियों से बालू खनन पर आमतौर 10 जून से 15 अक्टूबर तक यानी लगभग 4 महीने रोक रहती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि एनजीटी की रोक के बावजूद दुमका से बालू की आवाजाही आखिर कैसे जारी है और इस पूरे मामले में जिम्मेदारी कब तय होगी?




