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बलबड्डा में खास तरिके से की जाती है माँ की पूजा, 150 साल पुरानी परंपरा से कंधों पर बैठा कर करते है मां की विदाई

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गोड्डा जिले के मेहरमा प्रखंड स्थित बलबड्डा का प्राचीन दुर्गा मंदिर धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की परंपरा लगभग 150 वर्षों से चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा में आज भी धार्मिक विधि-विधान और पुराने रीति-रिवाजों का विशेष महत्व है। नवरात्र के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

स्थानीय स्तर पर हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात कही जाती है।स्थानीय बुजुर्ग धनंजय सिंह के अनुसार, बलबड्डा की दुर्गा पूजा का इतिहास काफी पुराना है और इसकी परंपरा जमींदारी काल से जुड़ी मानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, बलबड्डा स्टेट के जमींदार अमरेंद्र नाथ देव और नरेंद्रनाथ देव के वंशजों ने इस पूजा परंपरा की शुरुआत की थी।

हालांकि, मंदिर की स्थापना के सटीक वर्ष का प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन क्षेत्र में इसे डेढ़ सौ वर्ष से अधिक पुरानी धार्मिक परंपरा के रूप में जाना जाता है। मेला अध्यक्ष अरुण राम ने बताया कि बलबड्डा के प्राचीन दुर्गा मंदिर में मां दुर्गा की पूजा बंगाली पद्धति से की जाती है। नवरात्र के दौरान निर्धारित धार्मिक विधियों के अनुसार पूजा-अर्चना होती है। यहां की पारंपरिक पूजा पद्धति इस आयोजन को विशिष्ट पहचान देती है।श्रद्धालु मां के दरबार में पहुंचकर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं।

इस वर्ष दुर्गा पूजा के अवसर पर मां के गर्भगृह में प्रवेश और दर्शन से पहले भव्य झांकी निकाली गई। मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को रथ पर विराजमान कर ढोल-नगाड़ों के साथ पूरे गांव का भ्रमण कराया गया। इस दौरान गांव में धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल देखने को मिला। गांव भ्रमण के बाद विधिवत पूजा-अर्चना की गई और मां के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोले गए। इस विशेष आयोजन ने दुर्गा पूजा के उत्सव को और आकर्षक बना दिया।

बलबड्डा दुर्गा पूजा मेले के आयोजन में मेला अध्यक्ष अरुण राम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जानकारी के अनुसार, वे वर्ष 2000 ईस्वी से मेले का पूरा खर्च स्वयं उठाते आ रहे हैं। पिछले दो दशकों से अधिक समय से मेले के आयोजन से जुड़े उनके योगदान ने इस धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है। दुर्गा पूजा के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मेला और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।

बलबड्डा निवासी एवं मेला समिति के सदस्य नयन राम ने बताया कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कंधे पर उठाकर पारंपरिक तरीके से किया जाता है। यह परंपरा बलबड्डा की दुर्गा पूजा की विशिष्ट पहचान है। विजयादशमी के अवसर पर श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां को विदाई देते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई है।

बलबड्डा की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का भी रूप ले चुकी है। यहां मेला, रासलीला, संथाली नृत्य और रावण दहन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सूर्य सरोवर में गंगा आरती भी आयोजन का विशेष आकर्षण बनती है। काशी की तर्ज पर आयोजित गंगा आरती में श्रद्धालु भक्ति भाव से शामिल होते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक परंपरा के साथ स्थानीय संस्कृति को भी मंच मिलता है।

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