भारत ने अपने पड़ोसी देश चीन के साथ संबंध सुधारने की पहल करते हुए निवेश नियमों में ढील दी है। अब चीन भारतीय कंपनियों में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के तहत अपेक्षाकृत आसानी से निवेश कर सकेगा।

इससे पहले भारत ने एक ऐसा नियम बनाया था, जिसके तहत जिन देशों की सीमा भारत से लगती है, वे भारत में एफडीआई के तहत सीधे निवेश नहीं कर सकते थे और उन्हें सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती थी। भारत की भूमि सीमा पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान, नेपाल और चीन से लगती है। इस नियम का मुख्य उद्देश्य चीन से आने वाले निवेश पर निगरानी रखना था।
अब भारत ने नियमों में जो ढील दी है, उसके तहत चीन भारत में इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल्स जैसे क्षेत्रों में निवेश कर सकता है। नए नियमों के तहत चीनी कंपनियों के भारतीय कंपनियों में निवेश प्रस्तावों को लगभग 60 दिनों के भीतर मंजूरी मिल सकती है। इसके अलावा, चीनी कंपनियों को अब भारतीय कंपनियों में 10 प्रतिशत तक हिस्सेदारी लेने के लिए सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
2020 के गलवान घाटी संकट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था। इस घटना को अब लगभग छह साल हो चुके हैं। वहीं दूसरी ओर इस दौरान भारत और अमेरिका के संबंधों में भी कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भारत अपने तेल आयात को लेकर भी असमंजस की स्थिति में है। क्योंकि अमेरिका पहले ही भारत को रूस से तेल खरीदने को लेकर टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी देते हुए उसे बंद करबा चुका है।
Also Read- IEA के भरोसे के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बरकरार
भारत और चीन दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आती दिखाई दे रही हैं। इसकी शुरुआत पिछले साल ही हो चुकी है, जब अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात वर्षों बाद पहली बार शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइजेशन (SCO) की बैठक में हिस्सा लेने के लिए चीन का दौरा किया। इसके बाद दोनों देशों के उच्च अधिकारियों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए कई दौर की बैठकें हुई हैं।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि ग्लोबल साउथ को मजबूत करने के लिए चीन भारत के साथ मिलकर काम कर रहा है।
ग्लोबल साउथ एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ओशिनिया के विकासशील या कम विकसित देशों के समूह को कहा जाता है, जो मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध में स्थित हैं। यह अवधारणा इन देशों के समान औपनिवेशिक इतिहास, आर्थिक असमानताओं और विकास संबंधी चुनौतियों जैसे गरीबी और तेज़ जनसंख्या वृद्धि को दर्शाती है। वहीं ग्लोबल नॉर्थ शब्द का इस्तेमाल विकसित पश्चिमी देशों के लिए किया जाता है।





