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2.22 एकड़ (acres) जमीन को लेकर जगन्नाथ मंदिर में बैठक, तालाब प्रदूषण की जता रही है आशंका

2.22 एकड़ (acres) जमीन को लेकर जगन्नाथ मंदिर में बैठक, तालाब प्रदूषण की जता रही है आशंका
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500 बेड छात्रावास के लिए 2.22 एकड़ (acres)  जमीन के हस्तांतरण का विरोध, तालाब प्रदूषण की जताई आशंका जता रही है , सरायकेला खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड अंतर्गत आसंगी गांव में सरकारी जमीन 2.22 एकड़ (acres)   के हस्तांतरण को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा है। शनिवार को वार्ड नं. 25 स्थित जगन्नाथ मंदिर परिसर में सैकड़ों ग्रामीणों की बैठक हुई। बैठक के बाद ग्रामीणों ने प्रेस वार्ता कर उपायुक्त के आदेश से जियाडा के नाम की गई 2.22 एकड़  (acres) जमीन के फैसले को वापस लेने की मांग की।

आसंगी निवासी पितोवास प्रधान ने बताया कि मौजा आसंगी के खाता संख्या 342, प्लॉट संख्या 276 में कुल 4.42 एकड़ अनाबाद सरकारी जमीन है। इस जमीन पर आसंगी सहित आसपास के 6 गांवों के सहयोग से पिछले 3 वर्षों से एक भव्य जगन्नाथ मंदिर का निर्माण चल रहा है। उन्होंने कहा, “इस मंदिर को बनाने में बोरगिडी, बनडीह, कृष्णापुर, पार्वतीपुर, ईटागढ़ और बासुड़दा गांव के लोगों ने आर्थिक सहयोग दिया है। यह सिर्फ आसंगी का नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लोगों की आस्था का केंद्र बन रहा है।”

ग्रामीणों का आरोप है कि इसी भूखंड की 2.22 एकड़ जमीन उपायुक्त के आदेश पर बिना किसी ग्राम सभा की सहमति के झारखंड औद्योगिक विकास प्राधिकार यानी जियाडा के नाम हस्तांतरित कर दी गई है। जियाडा ने यहां आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए 500 बेड का छात्रावास बनाने की योजना बनाई है। पितोवास प्रधान ने कहा, “हम उद्योग के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन मंदिर की जमीन और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होने देंगे।” ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता क्षेत्र के एकमात्र रैयत तालाब को लेकर है। प्रस्तावित छात्रावास के ठीक नीचे करीब 9 एकड़ का तालाब स्थित है। ग्रामीणों के अनुसार गर्मी के दिनों में यही तालाब पशुओं के पानी पीने और लोगों के नहाने-धोने का एकमात्र साधन है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर मनसा पूजा, काली पूजा और दुर्गा पूजा की मूर्तियों का विसर्जन भी इसी तालाब में किया जाता है।

“500 बेड के छात्रावास से निकलने वाले सीवेज और मल-मूत्र की निकासी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। अगर यहां छात्रावास बन गया तो यह ऐतिहासिक तालाब पूरी तरह प्रदूषित होकर नष्ट हो जाएगा,” बैठक में मौजूद ग्रामीणों ने कहा। ग्रामीणों ने 1960 के दशक का हवाला देते हुए कहा कि औद्योगिक विकास के नाम पर उनके पूर्वजों ने आयडा यानी आज के जियाडा और एनआईटी के लिए अपनी रैयत जमीनें दी थीं। लेकिन बदले में आज तक क्षेत्र को न पक्की सड़क मिली, न नाली और न ही सीवेज लाइन।  आज भी हमारी सड़कें जर्जर हैं। जब पहले दी गई जमीन का लाभ हमें नहीं मिला तो अब दोबारा जमीन क्यों दें,” एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा।

बैठक में भारी संख्या में महिलाएं और पुरुष मौजूद थे। सभी ने एक स्वर में कहा कि मंदिर परिसर की इस जमीन पर केवल जगन्नाथ मंदिर और उसके आसपास सुंदर गार्डन का ही विकास होगा। इसके अलावा किसी भी प्रकार के निर्माण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जियाडा के नाम हुए हस्तांतरण को तुरंत रद्द किया जाए, अन्यथा वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। इस संबंध में जियाडा और जिला प्रशासन के अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी।

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