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रूपी सोरेन: नेमरा की मिट्टी से दुमका के चुनावी मैदान तक, संघर्ष और हिम्मत की कहानी

रूपी सोरेन: नेमरा की मिट्टी से दुमका के चुनावी मैदान तक, संघर्ष और हिम्मत की कहानी
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रांची में रूपी सोरेन के निधन की खबर के साथ झारखंड के एक ऐसे दौर की यादें भी ताजा हो गई हैं जब अलग झारखंड राज्य की मांग आंदोलन का रूप ले रही थी और शिबू सोरेन इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। उस दौर में उनका परिवार भी संघर्ष से अछूता नहीं रहा। घर की जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश और पति की चिंता इन सबके बीच रूपी सोरेन ने परिवार को संभाले रखा।

रूपी सोरेन का जीवन सार्वजनिक राजनीति में भले ही ज्यादा दिखाई नहीं दिया, लेकिन सोरेन परिवार के राजनीतिक सफर को समझने के लिए उनकी भूमिका अहम रही। शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक संघर्ष के दौरान वह परिवार की धुरी बनी रहीं। उनके जीवन की कहानी केवल एक बड़े राजनीतिक परिवार की महिला की कहानी नहीं बल्कि उस दौर के ग्रामीण झारखंड में एक महिला के संघर्ष, साहस और आत्मसम्मान की कहानी भी है। अलग राज्य के लिए आंदोलन कर रहे शिबू सोरेन जब कई दिनों तक घर नहीं आते थो तो रूपी सोरेन अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ उन्हें ढूंढने जंगल पहुंच जाया करती थीं।

शादी के बाद ही शुरू हो गया था संघर्ष का दौर

शिबू सोरेन और रूपी सोरेन की शादी 1 जनवरी 1962 को हुई थी। इसके बाद दोनों ने छह दशक से अधिक का वैवाहिक सफर साथ तय किया। लेकिन यह सफर सामान्य पारिवारिक जीवन तक सीमित नहीं रहा। शिबू सोरेन के आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष के कारण परिवार को लंबे समय तक अनिश्चित परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।

शिबू सोरेन के जेल जाने से लेकर लंबे समय तक घर से दूर रहने तक जैसी परिस्थितियों का असर सीधे परिवार पर पड़ता था। ऐसे समय में बच्चों और घर की जिम्मेदारी रूपी सोरेन के हिस्से में आती रही।

शादी के शुरुआती दिनों का एक प्रसंग उनके संघर्ष को समझने के लिए काफी है। जब शिबू सोरेन जेल में थे और उन्हें छुड़ाने के लिए परिवार के पास पर्याप्त साधन नहीं थे तब रूपी सोरेन मदद मांगने अपने मायके चांडिल पहुंचीं। परिवार की मदद से वह हजारीबाग पहुंचीं और शिबू सोरेन को जेल से बाहर लाकर नेमरा लाया गया। जेल से लौटने के बाद उनकी तबीयत खराब थी और रूपी सोरेन ने उनकी देखभाल की।

वह दौर उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने अपने जीवन में संघर्ष के ऐसे कई दौर देखे जिनमें परिवार को संभालने के साथ पति के आंदोलन से जुड़ी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ा।

जमीन बचाने से लेकर जंगल में पति की तलाश तक

नेमरा की जमीन को लेकर संघर्ष का एक प्रसंग रूपी सोरेन के स्वभाव की दृढ़ता को सामने लाता है। बताया जाता है कि शिबू सोरेन के जेल में रहने के दौरान एक महाजन कुछ लोगों के साथ उनके खेत पर पहुंचा और जमीन जोतने लगा। रूपी सोरेन ने इसका विरोध किया। जब वह नहीं माना तो उन्होंने धान काटने वाला हसुआ उठा लिया और उसके पीछे दौड़ पड़ीं।

उनके साथ उनकी ननद भी आ गईं और दोनों ने मिलकर जमीन पर कब्जे की कोशिश का विरोध किया। इसके बाद उस जमीन पर दोबारा कब्जे की कोशिश नहीं हुई। यह प्रसंग केवल जमीन के विवाद का नहीं था बल्कि उस समय की एक ग्रामीण महिला के अपने अधिकार के लिए खड़े होने की तस्वीर भी पेश करता है।

परिवार के एक बुजुर्ग ने उन्हें ताकतवर लोगों से टकराने से बचने की सलाह दी थी। इस पर उनका जवाब था कि जब जमीन आपकी है तो उसके बचाव में पीछे क्यों हटना।

शिबू सोरेन के आंदोलन के दिनों में पुलिस की पूछताछ भी परिवार तक पहुंचती थी। घर पर पुलिस आती और उनके बारे में जानकारी मांगती। ऐसे समय में भी रूपी सोरेन ने अपने जवाब में दृढ़ता दिखाई। बताया जाता है कि उन्होंने पुलिस से कहा था कि यह रूपी सोरेन का घर है और शिबू सोरेन जहां होंगे वहां जाकर उन्हें खोजा जाए।

एक और प्रसंग उनके जीवन की मुश्किलों को बेहद भावुक तरीके से सामने लाता है। जब शिबू सोरेन कई दिनों तक टुंडी के जंगल-पहाड़ों में रहते थे और परिवार को उनकी खबर नहीं मिलती थी तब रूपी सोरेन खुद उन्हें खोजने निकल पड़ी थीं। सास और ननद के साथ वह जंगल की ओर गईं। उनकी गोद में बेटा दुर्गा था।

चार बच्चों की मां और परिवार की मजबूत कड़ी

रूपी सोरेन और शिबू सोरेन के चार बच्चे हुए। उनके बड़े बेटे दुर्गा सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और जामा से विधायक भी रहे। वर्ष 2009 में उनके निधन ने परिवार को गहरा सदमा दिया।

दूसरे बेटे हेमंत सोरेन ने आगे चलकर झारखंड की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई और राज्य के मुख्यमंत्री बने। छोटे बेटे बसंत सोरेन भी राजनीति में सक्रिय रहे और दुमका से विधायक चुने गए। बेटी अंजनी सोरेन भी झामुमो से जुड़ी रहीं।

इस तरह परिवार की अगली पीढ़ी भी धीरे-धीरे राजनीति में सक्रिय होती गई। लेकिन इस राजनीतिक विस्तार के पीछे परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने वाली रूपी सोरेन की भूमिका घर के भीतर ही रही।

दुमका से जुड़ी थीं रूपी सोरेन की कई यादें

रूपी सोरेन का दुमका से भी गहरा संबंध रहा। झारखंड आंदोलन के दिनों में शिबू सोरेन जब दुमका में सक्रिय रहते थे तब रूपी सोरेन भी उनके साथ आती थीं। उस समय खिजुरिया में शिबू सोरेन का अपना आवास नहीं था। शिवपहाड़ के गिधनी में प्रदीप नारायण टुडू के घर पर रूपी सोरेन बच्चों के साथ रहती थीं।

उस समय दुर्गा सोरेन और हेमंत सोरेन काफी छोटे थे। वहीं रहकर दोनों ने पढ़ाई की। रूपी सोरेन बच्चों की देखभाल करने के साथ शिबू सोरेन का भी ख्याल रखती थीं।

बाद में जब खिजुरिया में शिबू सोरेन का आवास बना और रूपी सोरेन का वहां आना-जाना बना रहा। 1980 और 1990 के दशक में दुमका शिबू सोरेन की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका था। अलग झारखंड राज्य की मांग और झामुमो की राजनीति के बीच रूपी सोरेन परिवार को संभालने में लगी रहीं।

1999 में पहली बार बड़े चुनावी मैदान में उतरीं

रूपी सोरेन के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक राजनीतिक अध्याय 1999 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। 1998 के लोकसभा चुनाव में दुमका सीट पर शिबू सोरेन को भाजपा के बाबूलाल मरांडी से हार मिली थी। इसके बाद शिबू सोरेन राज्यसभा पहुंचे।

1999 में झामुमो ने दुमका से शिबू सोरेन की जगह उनकी पत्नी रूपी सोरेन को उम्मीदवार बनाया। चुनाव में उनके सामने भाजपा के बाबूलाल मरांडी थे। मुकाबला बेहद करीबी रहा और रूपी सोरेन महज 4,648 मतों के अंतर से चुनाव हार गईं।

चुनाव के बाद रूपी सोरेन ने कोई दूसरा लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा और उनका सक्रिय राजनीतिक जीवन सीमित हो गया। इसके बावजूद 1999 का दुमका चुनाव उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

वह ऐसे समय में चुनावी मैदान में उतरी थीं जब झारखंड आंदोलन और क्षेत्रीय राजनीति निर्णायक दौर से गुजर रही थी। उनका चुनाव लड़ना यह भी बताता है कि जरूरत पड़ने पर उन्होंने सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी स्वीकार करने से परहेज नहीं किया।

राजनीति से दूर लेकिन परिवार के सफर का हिस्सा बनी रहीं

चुनावी राजनीति से दूरी बनाने के बाद रूपी सोरेन का जीवन मुख्य रूप से परिवार के इर्द-गिर्द रहा। इस बीच सोरेन परिवार की राजनीतिक यात्रा आगे बढ़ती रही। बड़े बेटे दुर्गा सोरेन की असमय मृत्यु ने परिवार को झकझोर दिया वहीं हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन ने राजनीति में अपनी जगह बनाई।

रूपी सोरेन ने इस पूरे सफर को एक मां और परिवार की वरिष्ठ सदस्य के रूप में देखा। उनके जीवन में राजनीतिक मंचों की चमक कम थी, लेकिन संघर्ष के दिनों की जिम्मेदारियां ज्यादा थीं।

नेमरा की जमीन से लेकर टुंडी के जंगलों तक और दुमका के चुनावी मैदान तक रूपी सोरेन का जीवन कई ऐसे प्रसंगों से जुड़ा रहा, जिनमें संघर्ष और पारिवारिक जिम्मेदारी साथ-साथ दिखाई देती है।

उनका निधन सोरेन परिवार के लिए एक निजी क्षति है। लेकिन उनके जीवन को याद करने पर झारखंड के उस दौर की तस्वीर भी सामने आती है, जब आंदोलन, राजनीति और परिवार की जिम्मेदारियां एक-दूसरे से अलग नहीं थीं। रूपी सोरेन उसी दौर की एक ऐसी कड़ी थीं, जिनकी सार्वजनिक मौजूदगी सीमित रही, लेकिन परिवार के संघर्षपूर्ण सफर में उनकी भूमिका लगातार बनी रही।

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