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किसान के खेतों में पानी पहुंचाने के लिए Jharkhand government अपनाएगी सिंचाई की नई निती

किसान के खेतों में पानी पहुंचाने के लिए Jharkhand government अपनाएगी सिंचाई की नई निती
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किसानों को कृषी क्षेत्र में सुविधा पहुंचाने के लिए Jharkhand government सिंचाई के नए निती की ओर अग्रसर हो रही है , Jharkhand government  ने ऐसा लक्ष्य बनाया है कि किसानों के हर खेतों में सिंचाई  के पानी पहुंचाया जाएगा।  बता दों कि झारखंड में खेती का उत्पादन बढ़ाने के लिए Jharkhand government एक व्यापक सिंचाई नीति बनायी जा रही है,ताकि हर खेत तक पानी पहुंच सके इस नीति के लिए पर्यावरणविदों और जल विशेषज्ञों से सुझाव मांगे जा रहे हैं। इस संदर्भ में जाने-माने पर्यावरणविद आर. कल्लोल साहा ने सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। जिनमें महिला किसानों को कृषि क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका में सबसे आगे रखने का प्रस्ताव भी शामिल है।

उनका कहना है कि कुल कृषि कार्यबल में महिला किसानों का योगदान लगभग तीन-चौथाई है। बुवाई, निराई-गुड़ाई, सिंचाई, कटाई और भंडारण जैसी जिम्मेदारियां उठाने के बावजूद, वे जल प्रबंधन, संपत्ति के स्वामित्व और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बाहर रहती हैं। साहा झारखंड की मौजूदा स्थिति को समझने पर जोर देते हैं, राज्य भर में जल स्रोतों की क्षमता लगातार घट रही है। हर साल गाद जमा होने से तालाबों और टैंकों की भंडारण क्षमता एक से तीन प्रतिशत तक कम हो जाती है, जिससे लगभग एक-तिहाई छोटे जल ढांचे आंशिक रूप से बेकार हो जाते हैं।

ये तथ्य बताते हैं कि झारखंड अपनी सिंचाई प्रणाली के रखरखाव पर सालाना प्रति हेक्टेयर केवल ₹300 खर्च करता है यह राशि कई अन्य राज्यों द्वारा खर्च की जाने वाली राशि से दो से पांच गुना कम है। औसत रिचार्ज दर भी कम है, और अधिकांश क्षेत्रों में ग्रेविटी-आधारित (गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर) ढांचों की अधिकता नवाचार की गुंजाइश को सीमित करती है।

राज्य में कृषि मशीनीकरण लगभग 37 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत का आधा है। सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियाँ सिंचित क्षेत्र के केवल एक प्रतिशत हिस्से को कवर करती हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत अठारह प्रतिशत है। पुराने और नॉन-मॉड्यूलर पंप अक्सर खराब हो जाते हैं, और स्थानीय मरम्मत सेवाओं की कमी के कारण पंप लंबे समय तक बेकार पड़े रहते हैं। कुल मिलाकर, इन समस्याओं के परिणामस्वरूप सिंचाई प्रणाली अक्षम हो जाती है, जिसका सीधा असर फसल उत्पादन, भूजल की स्थिति और आजीविका पर पड़ता है।

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