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ईरान युद्ध के बाद भी सोने की चमक क्यों रही फीकी? अब सोने मे निवेश पर क्या बनाएं रणनीति?

ईरान युद्ध के बाद भी सोने की चमक क्यों रही फीकी? अब सोने मे निवेश पर क्या बनाएं रणनीति?
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ईरान के साथ बढ़ते युद्ध के बावजूद सोने की कीमतों में वह तेज उछाल नहीं आया जिसकी आम तौर पर उम्मीद की जाती है। आमतौर पर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट के समय निवेशक सोने को “सेफ-हेवन” मानकर खरीदते हैं। जिससे कीमतें बढ़ती हैं। लेकिन इस बार बाजार का व्यवहार थोड़ा अलग रहा।

संघर्ष की शुरुआत में सोने की कीमतों में तेजी आई, लेकिन बाद में कुछ निवेशकों ने मुनाफा बुक करने या नुकसान की भरपाई के लिए सोना बेच दिया। इससे कीमतें फिर से नीचे आ गईं। युद्ध के कारण ऊर्जा कीमतों और महंगाई के बढ़ने की आशंका है। इससे उम्मीद है कि अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। ऊंची दरों की वजह से डॉलर में मजबूती बनी रहती है और जब डॉलर मजबूत होता है तो सोना आमतौर पर कमजोर पड़ जाता है।

सोने की चमक फीकी रहने की एक और वजह लिक्विडिटी की ससम्या है। कभी-कभी बाजार में अचानक अनिश्चितता होने पर निवेशक नकदी की जरूरत के कारण हर तरह की संपत्ति बेच देते हैं। इसमें सोना भी शामिल है। इससे सोने की कीमत अस्थायी रूप से गिर सकती है।

लेकिन हमेशा सोने की चमक ऐसी नहीं रहेगी। जानकारों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा चलता है और तेल की कीमतें और बढ़ती हैं जिससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ती है तो सोने की चमक भी बढ़ेगी। यानि सोना फिर से मजबूत हो सकता है और नए रिकॉर्ड बना सकता है। कुछ बड़े बैंकों ने 2026 में सोने की कीमत लगभग $6,000–$6300 प्रति औंस तक जाने की संभावना भी जताई है। फिलहाल कॉमेक्स पर सोना 5000 डॉलर प्रति औंस के करीब कारोबार कर रह है। भारतीय बाजार में सोना 1.56 लाख प्रति 10 ग्राम तो चांदी 2.59 लाख प्रति किलो पर कारोबार कर रहा है।

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