आज है अंर्तराष्ट्रीय नर्स डे हर वर्ष 12 मई को आधुनिक नर्सिंग की जनक Florence Nightingale की जयंती के अवसर पर यह दिवस मनाया जाता है ।इस दिन का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं में नर्सों के योगदान को सम्मान देना और उनके प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना है.
अस्पतालों में मरीजों की देखभाल से लेकर आपातकालीन परिस्थितियों तक, नर्सें स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। कोरोना महामारी के दौरान नर्सों ने दिन-रात काम कर लाखों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन हमारे भारत की नर्स व्यस्था के बारे में बात करे तो थोड़ी दैनिय है क्यों की ऐसा मिडिया के सुत्रों का मानना है की हारे भारत में 670 लोगों पर मात्र एक नर्स है। और भारत के लिए नर्स दिवस मानना बहुत मुशकिल है ।वही भारत की कुछ स्वास्थ संस्था कहती है की कम से कम 1000 पर 3 होना चाहिए । लेकिन वर्तमान भारत में नर्सो की संख्या 1.9 से 1.96 ही हैं. यानी हमारा भारत अभी करीब 1.04 से 1.1 नर्स प्रति हजार आबादी पीछे चल रहा है.

भारत में नर्सों की कमी एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण हैं चलिए कुछ बिंदुओं पर चर्चा करते है
- कम वेतन और खराब कार्य परिस्थितियाँ
कई सरकारी और निजी अस्पतालों में नर्सों को लंबे समय तक काम करना पड़ता है, लेकिन वेतन अपेक्षाकृत कम मिलता है। इससे कई लोग इस पेशे को छोड़ देते हैं। - विदेशों में बेहतर अवसर
भारत की प्रशिक्षित नर्सें अक्सर United Kingdom, Canada, Australia और खाड़ी देशों में नौकरी करना पसंद करती हैं, क्योंकि वहाँ वेतन और सुविधाएँ बेहतर होती हैं। - नर्सिंग शिक्षा की सीमाएँ
ग्रामीण और छोटे शहरों में अच्छे नर्सिंग कॉलेजों की कमी है। कई संस्थानों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता भी कमजोर मानी जाती है। - काम का अत्यधिक दबाव
अस्पतालों में मरीजों की संख्या ज्यादा और नर्सों की संख्या कम होने से एक नर्स पर बहुत अधिक जिम्मेदारी आ जाती है। इससे मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ती है। - सामाजिक सम्मान की कमी
हालाँकि नर्सें स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ होती हैं, फिर भी कई जगह उन्हें डॉक्टरों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है। इससे युवाओं का आकर्षण इस पेशे की ओर कम होता है। - ग्रामीण क्षेत्रों में नियुक्ति की समस्या
कई नर्सें ग्रामीण इलाकों में काम करने से बचती हैं क्योंकि वहाँ सुविधाएँ, सुरक्षा और रहने की व्यवस्था कमजोर होती है। - सरकारी पद खाली रहना
कई राज्यों में लंबे समय तक नर्सों की भर्ती नहीं होती, जिससे हजारों पद खाली पड़े रहते हैं। - महामारी के बाद बढ़ता दबाव
COVID-19 के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र में काम का दबाव बढ़ा, जिससे कई नर्सों ने नौकरी छोड़ दी या मानसिक तनाव का सामना किया।
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए नर्सों की संख्या बढ़ाना, बेहतर वेतन, सुरक्षित कार्य वातावरण और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण बेहद जरूरी माना जा रहा है।
भारत सरकारर कई सारे नर्सिंग कॉलेज खोलने की योजनाओं पर चर्चा करता है लेकिन अभी तक धरातल पर नहीं उतर पाई।





