
भारतीय जनता पार्टी की पश्चिम बंगाल में प्रचंड जीत के बाद अब पूर्वी भारत की राजनीति को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं। झारखंड की सियासत में भी एक बड़ा सवाल तैरने लगा है। क्या आने वाले दिनों में झारखंड मुक्ति मोर्चा और बीजेपी फिर से साथ आ सकते हैं? राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा यूं ही नहीं उठ रही। इसके पीछे विधानसभा का गणित राज्यसभा की दो सीटों का समीकरण कांग्रेस-झामुमो के रिश्तों में संभावित तनाव और पुराना राजनीतिक इतिहास सब कुछ जुड़ा हुआ है।
झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 41 विधायकों का समर्थन चाहिए। अगर मौजूदा राजनीतिक ताकतों को देखें तो झामुमो और बीजेपी दोनों मिलकर आराम से बहुमत का आंकड़ा पार कर सकते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल अफवाह नहीं बल्कि संभावित विकल्प मान रहे हैं। फिलहाल विधानसभा में JMM के पास 34 सीटें हैं वहीं बीजेपी के पास 21 सीटें हैं। लेकिन कांग्रेस के 16 सीटों के सहयोग लेकर जेएमएम झारखंड की सत्ता पर काबिज है। झामुमो की राजनीति हमेशा से सत्ता संतुलन की राजनीति रही है। पार्टी ने समय-समय पर अपने हितों के हिसाब से गठबंधन बदले हैं। वहीं बीजेपी भी झारखंड में सत्ता से बाहर रहने के बावजूद संगठनात्मक रूप से मजबूत बनी हुई है।
आने वाले समय में राज्यसभा की दो सीटों को लेकर महागठबंधन के भीतर खींचतान बढ़ने की आशंका है। कांग्रेस चाहती है कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक ताकत के हिसाब से सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले जबकि झामुमो अपने क्षेत्रीय वर्चस्व से समझौता नहीं करना चाहेगा। कांग्रेस अगर ज्यादा दबाव बनाती है तो झामुमो के सामने नए राजनीतिक विकल्प तलाशने की मजबूरी पैदा हो सकती है। बीजेपी इसी मौके की तलाश में दिखाई देती है।
झारखंड की राजनीति में बीजेपी-झामुमो का साथ कोई नई बात नहीं है। शिबू सोरेन और बीजेपी के बीच अतीत में कई बार राजनीतिक समझ बनी। अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में बीजेपी-झामुमो गठबंधन सरकार भी चल चुकी है। हालांकि दोनों दलों की विचारधारा अलग रही लेकिन झारखंड की राजनीति में सत्ता और स्थिरता के लिए दोनों ने कई बार व्यावहारिक राजनीति का रास्ता चुना।
हेमंत सोरेन फिलहाल कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े दिखाई देते हैं लेकिन राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते। अगर केंद्र और राज्य की राजनीति में समीकरण बदलते हैं या कांग्रेस-झामुमो संबंधों में दरार गहराती है तो हेमंत सोरेन नई रणनीति पर विचार कर सकते हैं। बीजेपी के लिए भी झामुमो के साथ जाना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है क्योंकि इससे आदिवासी राजनीति में उसकी पैठ और मजबूत हो सकती है।
राज्यसभा सीटों की राजनीति, कांग्रेस-झामुमो के रिश्तों में संभावित खटास और सत्ता के समीकरण आने वाले महीनों में नई तस्वीर बना सकते हैं। फिलहाल यह केवल राजनीतिक कयास हैं लेकिन इतना तय है कि अगर परिस्थितियां बदलीं तो झारखंड में बीजेपी और झामुमो का साथ फिर से राजनीति का सबसे बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है।
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