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प्राकृतिक खेती से श्रीमती बलेमा सामड ने लिखी सफलता की नई कहानी, एक एकड़ में ₹53 हजार का शुद्ध लाभ

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प्राकृतिक खेती से श्रीमती बलेमा सामड ने लिखी सफलता की नई कहानी, एक एकड़ में 53 हजार का शुद्ध लाभ पर निर्भरता छोड़ अपनाया प्राकृतिक खेती का मॉडल

संतोष वर्मा

चाईबासाः पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर प्रखंड अंतर्गत बिंडासोर्जोम गांव की महिला किसान श्रीमती बलेमा सामड ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। सीमित कृषि भूमि और खेती की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों के बीच उन्होंने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती का ए-ग्रेड मॉडल अपनाया। प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग, जैविक आदानों के प्रयोग और फसल विविधीकरण के माध्यम से उन्होंने खेती की लागत को नियंत्रित करते हुए बेहतर आमदनी अर्जित की है। उनकी यह पहल ग्रामीण क्षेत्र की अन्य महिला किसानों एवं छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही है।

रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ाया कदम

प्राकृतिक खेती अपनाने से पहले श्रीमती बलेमा सामड को खेती के लिए बाजार से रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक खरीदने पड़ते थे। प्रत्येक फसल चक्र में खाद एवं कीटनाशकों पर होने वाला खर्च उनकी खेती की लागत को बढ़ा देता था। सीमित भूमि होने के कारण उत्पादन से प्राप्त आमदनी का एक बड़ा हिस्सा खेती के खर्च में चला जाता था, जिससे परिवार के लिए पर्याप्त बचत करना चुनौतीपूर्ण था। इसके अतिरिक्त, रासायनिक आदानों पर

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से बदली खेती की तस्वीर, रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों

निर्भरता के कारण मिट्टी की उर्वरता, नमी धारण करने की क्षमता और जैविक गुणवत्ता को बनाए रखना भी महत्वपूर्ण चुनौती थी। ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से जुड़ना उनके कृषि जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित हुआ। मिशन के अंतर्गत उन्हें प्राकृतिक खेती के मूल सिद्धांतों, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और खेत में ही प्राकृतिक जैव-आदान तैयार करने की तकनीकों का प्रशिक्षण मिला। प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी और तकनीकी मार्गदर्शन का उपयोग करते हुए उन्होंने अपने पूरे एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती का मॉडल लागू किया। उन्होंने बाजार से कृत्रिम उर्वरक एवं रासायनिक कीटनाशक खरीदना बंद कर दिया और खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग को प्राथमिकता दी।

स्थानीय संसाधनों से तैयार किए प्राकृतिक जैव-आदान

प्राकृतिक खेती की सफलता में खेत की आवश्यकताओं के अनुरूप प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग महत्वपूर्ण रहा। श्रीमती बलेमा सामड ने बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, अग्निअस्त्र, सुपर कम्पोस्ट और अंडा टॉनिक जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल किया। बीजामृत का उपयोग बीज उपचार के लिए किया गया, जबकि जीवामृत के माध्यम से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया गया। घनजीवामृत और सुपर कम्पोस्ट का उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने तथा पोषक तत्व उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया। नीमास्त्र और अग्निअस्त्र जैसे प्राकृतिक घोलों का उपयोग फसलों को कीटों से बचाने के लिए किया गया। वहीं, अंडा टॉनिक का उपयोग पौधों की वृद्धि एवं फलों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से किया गया। इन तकनीकों को अपनाने से खेती में बाहरी बाजार से खरीदे जाने वाले रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करने में मदद मिली। स्थानीय संसाधनों पर आधारित खेती ने उनके लिए कम लागत में उत्पादन करने की संभावनाएं भी बढ़ाईं।

फसल विविधीकरण से बढ़ा उत्पादन और आमदनी का अवसर

श्रीमती बलेमा सामड ने अपने खेत में केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय फसल विविधीकरण को अपनाया। उन्होंने करेला, बरबटी, झींगा, नेनुआ और मक्का जैसी फसलों की खेती की। अलग-अलग फसलों को लगाने से खेत का उपयोग बेहतर तरीके से किया जा सका और परिवार को विभिन्न प्रकार की उपज प्राप्त हुई। उन्होंने जून 2026 को फसलों की बुवाई की। पौधों की नियमित देखभाल, प्राकृतिक जैव-आदानों के उपयोग और समय पर तुड़ाई के माध्यम से सब्जियों की कुल 18 बार व्यावसायिक तुड़ाई की गई। बार-बार तुड़ाई से बाजार में सब्जियां उपलब्ध कराने और नियमित रूप से आमदनी प्राप्त करने का अवसर मिला। फसल विविधीकरण ने खेती को अधिक व्यवस्थित बनाने के साथ-साथ एक ही फसल पर निर्भरता कम करने में भी मदद की। इस प्रकार प्राकृतिक खेती और विभिन्न फसलों के समन्वय से श्रीमती सामड ने अपने सीमित खेत से बेहतर आर्थिक परिणाम प्राप्त किए।

12 हजार की लागत पर 65 हजार की सकल आय

श्रीमती बलेमा सामड की प्राकृतिक खेती का सबसे महत्वपूर्ण पहलू खेती की लागत और उससे प्राप्त आय का संतुलन है। *एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती के माध्यम से उन्हें लगभग 1,800 किलोग्राम कुल उत्पादन प्राप्त हुआ। खेती की कुल लागत ₹12,000 रही। मुख्य फसलों से ₹55,000 तथा सह-फसलों से ₹10,000 की आय प्राप्त हुई। इस प्रकार उनकी कुल सकल आय ₹65,000 रही और खेती की लागत घटाने के बाद ₹53,000 का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।* यह आर्थिक उपलब्धि दर्शाती है कि सीमित भूमि वाले किसानों के लिए खेती की लागत पर नियंत्रण रखना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना कितना महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक खेती के साथ फसल विविधीकरण अपनाकर श्रीमती सामड ने यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि छोटे खेत में भी सुनियोजित कृषि पद्धति के माध्यम से बेहतर आय अर्जित करने की संभावना है।

मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पहल

प्राकृतिक खेती का लाभ केवल आर्थिक आमदनी तक सीमित नहीं है। इस पद्धति में स्थानीय संसाधनों से तैयार जैव-आदानों का उपयोग किया जाता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। जीवामृत, घनजीवामृत और सुपर कम्पोस्ट जैसी सामग्रियों का नियमित एवं उचित उपयोग मिट्टी की जैविक गुणवत्ता सुधारने में सहायक हो सकता है। प्राकृतिक कीट नियंत्रण के उपायों को अपनाने से खेती में रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करने की दिशा में भी मदद मिलती है। इसके साथ ही खेत में उत्पादित विभिन्न प्रकार की सब्जियां परिवार के भोजन में विविधता लाने में सहायक होती हैं। श्रीमती बलेमा सामड द्वारा प्राकृतिक खेती को अपनाना आजीविका, मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जिला प्रशासन निरंतर प्रयासरत

पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त श्री मनीष कुमार ने कहा, “प्राकृतिक खेती किसानों की खेती लागत कम करने, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और उनकी आमदनी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। बलेमा सामड जैसी महिला किसानों की सफलता ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए प्रेरणादायक है। किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जिला प्रशासन निरंतर प्रयासरत है। प्राकृतिक खेती एवं फसल विविधीकरण को अपनाकर किसान अपनी आजीविका को अधिक मजबूत बना सकते हैं।”*

प्राकृतिक खेती से कम खर्च में बेहतर ढंग से खेती करने की मिली नई राह

महिला किसान श्रीमती बलेमा सामड ने कहा, *”पहले खेती में खाद और कीटनाशक खरीदने पर काफी खर्च करना पड़ता था। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से प्रशिक्षण मिलने के बाद मैंने अपने खेत में प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाया। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से प्राकृतिक खाद और कीट नियंत्रण के उपायों का उपयोग किया। अलग-अलग सब्जियों की खेती करने और कई बार तुड़ाई से मुझे अच्छी आमदनी प्राप्त करने का अवसर मिला। प्राकृतिक खेती से मुझे अपनी खेती को कम खर्च में बेहतर ढंग से करने की नई राह मिली है। मैं चाहती हूं कि दूसरे किसान भी प्राकृतिक खेती की तकनीकों को सीखें और अपनाएं।”*

अन्य किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण

श्रीमती बलेमा सामड की सफलता यह संदेश देती है कि खेती में बदलाव लाने के लिए केवल अधिक भूमि या महंगे कृषि संसाधनों की आवश्यकता नहीं है। उचित प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों का उपयोग, फसल विविधीकरण और नियमित देखभाल के माध्यम से छोटे एवं सीमांत किसान भी अपनी खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के माध्यम से प्राप्त प्रशिक्षण को अपने खेत में लागू कर श्रीमती सामड ने खेती की लागत को नियंत्रित करने और आय बढ़ाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक खेती को अपनाकर उन्होंने न केवल अपनी कृषि गतिविधियों को नई दिशा दी है, बल्कि यह भी दिखाया है कि स्थानीय संसाधनों और वैज्ञानिक कृषि मार्गदर्शन का समन्वय किसानों की आजीविका को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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