Deoghar News: विश्वकर्मा पूजा नज़दीक है और शहर के कुम्हार अपने चाक पर एक बार फिर उम्मीदों की मिट्टी को आकार देने में लगे हैं। खास तौर पर देवघर के बरमसिया मोहल्ले में, जहां पीढ़ियों से कुम्हार परिवार इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं, आज भी पूरे परिवार के लोग मिलकर मूर्तियों को तैयार कर रहे हैं।

हालांकि इस बार मौसम और बाजार दोनों ही इनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। लगातार हो रही बारिश के कारण मिट्टी गीली हो जा रही है और मूर्तियां बनाने का काम प्रभावित हो रहा है। वहीं दूसरी ओर, मिट्टी और मूर्ति बनाने में उपयोग होने वाली सामग्री की कीमतों में भारी वृद्धि ने इन कारीगरों की लागत बढ़ा दी है।
विश्वकर्मा पूजा में छोटी मूर्तियों की मांग
विश्वकर्मा पूजा में मुख्य रूप से छोटी मूर्तियों की मांग रहती है, जिन्हें दुकानों, वर्कशॉप्स और अन्य प्रतिष्ठानों में पूजा के लिए स्थापित किया जाता है। इनकी कीमत आम तौर पर कम रखी जाती है ताकि हर वर्ग के लोग इन्हें खरीद सकें, लेकिन कुम्हारों के लिए इस बार लागत निकालना भी एक चुनौती बन गया है।
बरमसिया मोहल्ले के कई परिवार अब भी इस परंपरागत काम से जुड़े हुए हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, हर कोई अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा है। बच्चे दिन में पढ़ाई करते हैं और शाम को मूर्तियों के रंग-रोगन में हाथ बंटाते हैं। एक मूर्ति को तैयार करने में कई दिन लगते हैं और उसके बाद बाजार में बिक्री की अनिश्चितता और भी चिंता बढ़ा देती है।
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स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिलती। न तो प्रशिक्षण, न ही कोई वित्तीय सहयोग। ऐसे में कई परिवार इस पारंपरिक पेशे को छोड़ चुके हैं और दूसरे कामों की तलाश में निकल पड़े हैं।
फिर भी, कुछ परिवार अब भी इस कला और परंपरा को जीवित रखने में लगे हैं, क्योंकि यह सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि उनकी पहचान है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में सरकार और समाज की ओर से थोड़ी मदद मिले, तो यह fading कला फिर से चमक सकती है।





