झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सरना धर्म कोड लागू करने की मांग को लेकर पत्र लिखे जाने के बाद देशभर में इस मुद्दे ने फिर से जोर पकड़ लिया है। आदिवासी संगठनों ने केंद्र सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मों की तरह सरना धर्म को भी अलग पहचान मिलनी चाहिए।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि वर्षों से सरना धर्म मानने वाले लोगों की अलग धार्मिक पहचान की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। संगठनों के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी आदिवासियों के हितों की अनदेखी कर रही है। वहीं कुछ नेताओं ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी भाजपा से “समझौता” करने के आरोप लगाए हैं।
संगठनों ने साफ कहा कि अगर आगामी जनगणना में सरना धर्म कोड को शामिल नहीं किया गया तो देशव्यापी आंदोलन चलाया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर 16 मई को Nagpur में राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न राज्यों के आदिवासी संगठन शामिल होंगे। सम्मेलन में आगे की रणनीति और आंदोलन की रूपरेखा तय की जाएगी।
आदिवासी नेताओं का कहना है कि सरना धर्म प्रकृति पूजा पर आधारित है और इसकी अपनी अलग परंपरा, संस्कृति और धार्मिक मान्यताएं हैं। इसलिए इसे किसी अन्य धर्म की श्रेणी में रखना आदिवासी समाज की पहचान के साथ अन्याय है।
संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि आगामी जनगणना में सरना धर्म कोड को अलग कॉलम के रूप में शामिल किया जाए, ताकि आदिवासी समुदाय की वास्तविक धार्मिक पहचान दर्ज हो सके।





