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निर्जला महा एकादशी (Maha Ekadashi) पर लोगों में उत्साह , बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना

On: June 25, 2026 1:01 PM
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निर्जला महा एकादशी (Maha Ekadashi) पर लोगों में उत्साह , बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना
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आगामी आज ही 25 जून 2026 को आयोजित होने वाली निर्जला महा एकादशी (Maha Ekadashi) के मद्देनजर रखते हुए।  सरिया बगोदर सरिया एसडीएम संतोष कु गुप्ता ने  निर्जला महा एकादशी (Maha Ekadashi) पर  राजदह धाम पहुंचकर तैयारियों एवं सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने पूरे मंदिर परिसर और मेला क्षेत्र का जायजा लेते हुए संबंधित अधिकारियों एवं समिति सदस्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान एसडीएम ने कहा कि निर्जला माह एकादशी  (Maha Ekadashi)  के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। ऐसे में सभी आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी कर ली जाएं ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। वहीं राजदह धाम समिति के अध्यक्ष सुरेश भारती ने बताया कि आयोजन की लगभग सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

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एसडीएम संतोष कु गुप्ता ने बताया कि प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुरक्षा एवं सुविधा के लिए अग्निशमन वाहन, मेडिकल टीम, मजिस्ट्रेट की तैनाती तथा पर्याप्त संख्या में पुलिस बल की व्यवस्था की गई है पुलिस जवान पूरे आयोजन के दौरान निगरानी रखेंगे, ताकि निर्जला महा एकादशी का पर्व शांतिपूर्ण एवं व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सके। इस दौरान समिति के सदस्य धर्मबीर कुमार संजय कुशवाहा राजकुमार वर्मा रमेश शर्मा छट्ठू यादव सुरेश यादव कुमार एस यादव राजकुमार सिंहा गंभीर कु रजक समेत समिति के दर्जनों सदस्य उपस्थित थे।

बता दें कि  पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत के समय में, पांडु के पुत्र भीमसेन न केवल एक शक्तिशाली योद्धा माने जाते थे , और उन्हें भोजन का भी बहुत शौक था। जहां उनका पूरा परिवार हर एकादशी (चंद्र पखवाड़े का ग्यारहवां दिन) को व्रत रखता था, वहीं भीम के लिए बिना भोजन के रहना आसान नहीं था। उन्हें हमेशा यह चिंता रहती थी कि व्रत न रखने के कारण वे उस आध्यात्मिक पुण्य से वंचित रह जाएंगे जो परिवार के अन्य सदस्यों को मिलता था।

इस दुविधा का समाधान खोजने के लिए भीम ने ऋषि व्यास से परामर्श किया। भीम की परेशानी को समझते हुए, ऋषि ने एक सरल उपाय सुझाया कि भीम को साल में केवल एक बार  वो भी ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन पूर्ण व्रत रखना था। वैसे  इस व्रत के दौरान उन्हें पूरे चौबीस घंटे तक भोजन और जल दोनों का त्याग करना था। ऋषि व्यास ने उन्हें आश्वासन दिया कि इस कठोर व्रत का पालन करने से उतना ही आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होगा जितना कि पूरे वर्ष की प्रत्येक एकादशी का व्रत रखने से मिलता है। इसी कारण से, इस व्रत को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

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