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मां आज भी दरवाजे पर टिकी निगाहों से बेटे का इंतजार करती है…

On: May 10, 2026 1:48 PM
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मां आज भी दरवाजे पर टिकी निगाहों से बेटे का इंतजार करती है...
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रांची | हटिया

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राजधानी रांची के हटिया स्थित एक ओल्ड एज होम की दहलीज पर हर दिन एक मां की आंखें अपने बेटे का इंतजार करती हैं। उम्र के उस पड़ाव पर, जब मां को सबसे ज्यादा अपने बच्चों के सहारे की जरूरत होती है, उसी वक्त उसे अपनों ने अकेला छोड़ दिया।

वृद्धाश्रम में रहने वाली बुजुर्ग महिला की कहानी सुनकर वहां आने वाला हर शख्स भावुक हो जाता है। बताया जाता है कि करीब पांच साल पहले उनका बेटा उन्हें वृद्धाश्रम छोड़कर गया था। जाते समय उसने मां से कहा था — “आप यहीं इंतजार करिए, मैं खाना लेकर आता हूं।”

लेकिन वह बेटा फिर कभी लौटकर नहीं आया।

 वो मां जीसके  तारिफ में मां शब्द ही काफी  है… आज उस मां का जीवन  अपनों के प्यार भरे लफ्ज  के लिए मोहताज हो गई है ….

पांच साल से दरवाजे पर टिकी हैं आंखें

वृद्धाश्रम के कर्मचारियों के अनुसार, बुजुर्ग मां आज भी हर आहट पर दरवाजे की ओर देखने लगती हैं। किसी के आने की आवाज सुनते ही उनकी आंखों में उम्मीद जग जाती है कि शायद उनका बेटा लौट आया हो।

वह अक्सर धीमी आवाज में कहती हैं — “मेरा बेटा आएगा… जरूर आएगा…”

उनकी यह बात सुनकर वहां मौजूद लोग भी भावुक हो उठते हैं।

जिस मां ने अपने बच्चे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, रातों की नींद त्यागकर उसे बड़ा किया, आज वही मां अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलेपन का दर्द झेल रही है। जिन्होनें हर उम्र अपने बच्चे को अपने दामन से बांधे रखा आज वही मां  अपने ही बेटे की प्यार के लिए आश लगाए बैठी है …

समाज में बढ़ती संवेदनहीनता की यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। आखिर आधुनिकता और व्यस्त जीवन के बीच रिश्तों  की कोई जगह नहीं रह गई है ..

वृद्धाश्रम बना सहारा

हटिया स्थित ओल्ड एज होम में कई ऐसे बुजुर्ग रह रहे हैं, जिन्हें उनके अपने ही छोड़ चुके हैं। कोई बेटे के इंतजार में है, तो कोई बेटी की एक झलक पाने को तरस रहा है।

वृद्धाश्रम के संचालकों का कहना है कि यहां रहने वाले कई बुजुर्ग अपनों के लौटने की आस में हर दिन गुजारते हैं। कुछ की आंखों में शिकायत है, तो कुछ के दिल में आज भी अपने बच्चों के लिए सिर्फ दुआएं हैं।

रिश्तों को बचाने की जरूरत

यह कहानी सिर्फ एक मां की नहीं, बल्कि समाज के उस बदलते चेहरे की तस्वीर है, जहां बुजुर्गों का अकेलापन लगातार बढ़ता जा रहा है। जरूरत है कि परिवार अपने बुजुर्गों को बोझ नहीं, बल्कि अपने जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद समझें।

क्योंकि मां-बाप सिर्फ जिम्मेदारी नहीं होते…
वे घर की वो नींव होते हैं, जिनके बिना हर रिश्ता अधूरा लगता है।

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