भारत में दशकों से चली आ रही नक्सलवाद की समस्या अब अपने अंतिम चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में दिए अपने बयान में कहा कि देश से नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है और इसका सबसे बड़ा केंद्र रहा बस्तर अब “विकास के पथ” पर अग्रसर है। सरकार द्वारा 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण उन्मूलन की जो समय-सीमा तय की गई थी, उसके ठीक पहले यह दावा एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है।

बस्तर में लाल आतंक से विकास तक का सफर
बस्तर कभी नक्सलवाद का गढ़ माना जाता था। वहां लाल आतंक के कारण विकास कार्य लगभग ठप थे। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। गृह मंत्री के अनुसार, हर गांव तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई गई हैं। स्कूल, राशन की दुकानें, स्वास्थ्य केंद्र और पहचान पत्र जैसी आवश्यक चीजें अब आम लोगों तक उपलब्ध हैं। लोगों को नियमित रूप से खाद्यान्न भी मिल रहा है, जिससे जीवन स्तर में सुधार आया है।
सख्ती और संवाद की दोहरी नीति
सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए सख्ती और संवाद दोनों का रास्ता अपनाया। अमित शाह ने स्पष्ट कहा कि जो नक्सली हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उनके पुनर्वास की पूरी व्यवस्था की जाएगी। लेकिन जो हिंसा का रास्ता अपनाएंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी।
सुरक्षा बलों और आदिवासियों की भूमिका
इस उपलब्धि का श्रेय सुरक्षा बलों विशेषकर सीआरपीएफ, कोबरा कमांडो और छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ ही स्थानीय आदिवासी समुदाय को भी दिया गया है। उनके सहयोग के बिना यह बदलाव संभव नहीं था। पिछले दो वर्षों में हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, हजारों गिरफ्तार हुए और कई मुठभेड़ों में मारे गए।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
नक्सलवाद के मुद्दे पर राजनीतिक बहस भी तेज रही। सत्तारूढ़ दल ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसके लंबे शासनकाल में आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं हो पाया। जिससे नक्सलवाद को बढ़ावा मिला। वहीं विपक्ष ने सरकार के दावों और तरीकों पर सवाल भी उठाए।
राज्य सरकार का दावा
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने दावा किया कि राज्य में सशस्त्र नक्सली पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं और बचे हुए कुछ लोग भी जल्द ही आत्मसमर्पण कर देंगे। उनके अनुसार तकनीक आधारित खुफिया तंत्र और सटीक सुरक्षा अभियान इस सफलता के मुख्य कारण रहे हैं।
आगे की राह है विश्वास और विकास
हालांकि नक्सलवाद के खात्मे का दावा किया जा रहा है। लेकिन सरकार का मानना है कि लोगों का भरोसा जीतने में अभी समय लगेगा। बस्तर में मौजूद सुरक्षा शिविरों को धीरे-धीरे स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचों में बदला जाएगा। यह कदम विकास को स्थायी बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में दिए 90 मिनट के अपने भाषण में साफ किया कि गरीबी से नक्सलवाद नहीं बल्कि नक्सलवाद की गरीबी बढ़ी। अमित शाह ने चेतावनी के अंदाज में कहा कि ये बीजेपी की सरकार है जो हथियार की भाषा समझते हैं उन्हें पहले समझाएंगे और अगर नहीं समझे तो उनको उन्हीं की भाषा में समझाया जाएगा। अगर सरकार के दावे पूरी तरह सही साबित होते हैं तो यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। नक्सलवाद, जिसने दशकों तक हजारों लोगों की जान ली और करोड़ों लोगों को प्रभावित किया, उसका अंत देश को नई दिशा दे सकता है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि विकास की यह गति बनी रहे और जिन क्षेत्रों ने हिंसा का लंबा दौर देखा है वहां शांति और समृद्धि स्थायी रूप से स्थापित हो सके।
1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक गांव से भारत में नक्सलवाद की शुरुआत हुई थी। यह आंदोलन किसान विद्रोह के रूप में शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व कम्युनिस्ट नेताओं चारू मजूमदार , कानू सान्याल और जंगल संथाल ने किया था।
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