अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया क्रैश कर चुका है। मिडिल ईस्ट संकट पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। होर्मुज स्ट्रेट अभी भी बंद है। जिससे कच्चे तेल का भाव एक बार फिर से 116 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। जियोपॉलिटिकल समस्या और ग्लोबल सप्लाई संकट का असर इंडियन करेंसी पर साफ दिखाई दे रहा है। इतिहास में पहली बार रुपया लुढ़ककर 95 के पार पहुंच चुका है। जी हां एक अमेरिकी डॉलर का भाव आज 95 रुपए 20 पैसे पर पहुंच गया।
बढ़ती तेल की कीमतों का असर भारतीय बॉन्ड बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। 10 साल का भारतीय बॉन्ड की यील्ड 7 परसेंट के पार पहुंच चुका है। रुपया केवल एक दिन में 0.3 परसेंट टूटा है। अगर आखिरी तिमाही की बात करें तो रुपया पिछले तीन महीनों में 4.4 परसेंट कमजोर हुआ है।
केवल पिछले एक हफ्ते में रुपए में 1 परसेंट की कमजोरी आई है। पिछले चार हफ्ते से लगातार रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता चला जा रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारतीय शेयर बाजार से निकलना लगातार जारी है। 25 मार्च को FII ने भारतीय शेयर बाजार में 1800 करोड़ से ज्यादा की बिकवाली की है। वहीं 27 मार्च को 4300 करोड़ से ज्यादा की बिकवाली की है।
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी और गिरते रुपए का असर भारती बॉन्ड बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। 10 साल के भारतीय बॉन्ड की यील्ड 21 महीने बाद पहली बार 7 परसेंट को पार कर चुका है। भारत ज्यादातर जरूरतें आयात पर निर्भर करती है। अगर कच्चे तेल की बात करें को अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी तेल भारत आयात करता है। ऐसे में रुपए में कमजोरी से भारत का आयात महंगा होगा जिसका असर कंज्यूमर और देश के रिजर्व पर दिखने को मिलेगा।





