झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा JTET और सरकारी नियुक्तियों में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषा को शामिल करने के मुद्दे पर राज्य में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस मामले को लेकर रांची के करमटोली स्थित राज्य के सबसे पुराने आदिवासी हॉस्टल परिसर में आदिवासी छात्र संगठन की ओर से प्रेस वार्ता आयोजित की गई।

इस दौरान आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय संयोजक सुशील कुमार मिंज कहा कि भोजपुरी, मगही और अंगिका ये सब बिहार की भाषा है । इसे झारखंड में मान्यता नहीं मिलना चाहिए। इन भाषाओं के कारण JTET एक्जाम का QUALIFIED PAPER लिखना पड़ता है ।अगर बिहार सरकार कोई भी झारखंड की कोई क्षेत्रिय भाषा अपने EDUCATION SYSTEM में लागू नहीं कर रहा है तो झारखंड सरकार मान्यता क्यों दे रखी है। आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय संयोजक का कहना है की यदि हमारे मांग पर विचार नहीं किया गया तो हम झारखंड करने बंद की घोषणा करेंगे।
आदिवासी छात्र संघ के नेताओं का ऐसा भी कहना – कि झारखंड की अपनी एक अलग भाषाई और सांस्कृतिक पहचान है, जिसे संरक्षित करना चाहिए। उन्होंने तर्क के साथ कहा की प्राथमिकता राज्य की स्थानीय और आदिवासी भाषाओं जैसे संथाली, मुंडारी, हो, खड़िया, कुरमाली और नागपुरी—को दी जानी चाहिए। नेताओं ने आगे आरोप लगाया कि क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में “बाहरी” जनजातियों से जुड़ी भाषाओं को शामिल करने से झारखंड की अद्वितीय पहचान कमज़ोर पड़ सकती है।
और अब आपको बता दें की झारखंड में JTET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने के मुद्दे पर गठित पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति की दूसरी और लगभग अंतिम बैठक की हुई। बैठक के बाद वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने बताया कि समिति अपनी रिपोर्ट अगले 2-3 दिनों में मुख्यमंत्री और कैबिनेट को सौंपेगी, जिसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा। बैठक में परीक्षा के भाषा पैटर्न पर विस्तार से चर्चा हुई। कई सदस्यों ने कहा कि अभी पार्ट-2 में 15 जनजातीय भाषाओं में से एक चुनना अनिवार्य है, जिससे कुछ जिलों के कई अभ्यर्थियों को परेशानी हो सकती है।
लेकिन बैठक के सदस्यों ने भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को JTET और अन्य परीक्षाओं में शामिल करने की बात कही । उनका कहना था कि झारखंड के कई इलाकों में बड़ी संख्या में लोग इन भाषाओं का उपयोग करते हैं, इसलिए इन्हें भी मान्यता मिलनी चाहिए। बैठक में मंत्री सुदिव्या कुमार सोनु ने समिति में जनजातीय और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठाया। अब समिति की रिपोर्ट मुख्यमंत्री और कैबिनेट को भेजी जाएगी, जिसके बाद इस मामले में बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
पूरा मामला जानें
राज्य सरकार की नई नियुक्ती और JTET नियमावली से भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसे क्षेत्रीय भाषाओं को सुची से बाहर कर दिया गया था । इन भाषाओं को बोलने वाले कुछ संगठन और समुदायों के लोग इसका विरोध करने लगे। भाषायी समर्थकों का कहना था की पलामु समेत कई बड़े क्षेत्रों में इन भाषाओं का प्रयोग की जाता है। इसलिए भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसे क्षेत्रीय भाषाओं को सुची से बाहर करना छात्रों के साथ अन्याय होगा। जिसके बाद दोबारा सुची में जोड़ दिया गया था। वही दुसरी तरफ झारखंडी भाषा ,संस्कृति और संगठन से जुड़े लोग इसका विरोध कर रहे है। उनका मानना है की आदिवासी का मूल आस्वित्व खतरा में पड़ सकता है। राज्य सरकार ने दोनों पक्षों की बातों पर विचार कर रही हैं।
राज्य सरकार को कोई भी कदम सोच- समझ कर उठानी पड़ेगी । हालांकि इस बीच भाषा विवाद अब राजनीतिक और सामाजिक रूप में बदलता जा रहा है ।
ALSO READ – रेलवे यार्ड से गांजा तस्करी के एक बड़े नेटवर्क का हुआ भंडाफोड़ :दो तस्करों को किया गया गिरफ्तार




