झारखंड के चाईबासा जिले के सारंडा का एक ऐसा गांव जहां आजादी के 79 साल बाद भी Development की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच सकी है। न सड़क, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही शिक्षा की समुचित व्यवस्था। हैरानी की बात यह है कि यहां आज तक यहां कोई विधायक या सांसद नहीं पहुंचा पाया। ग्रामीणों ने बताया कि यहां मुखिया सिर्फ Development के नाम पर वोट लेने आते है ,लेकिन आज तक कोई Development नहीं कर पाय, लेकिन अब पहली बार मनोहरपुर के बीडीओ गांव पहुंचे हैं। समस्याओं को लेकर ग्रामीणों के साथ बैठक की है। जिससे ग्रामीणों में उम्मीद जगी है।कभी नक्सल प्रभाव और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण चर्चा में रहने वाला सारंडा का सोदा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। गंगदा पंचायत के अंतर्गत आने वाले इस गांव की आबादी करीब 1200 है, लेकिन यहां विकास की तस्वीर बेहद धुंधली नजर आती है।

गांव तक पहुंचने वाली जर्जर सड़क का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीडीओ को खुद बाइक चलाकर गांव तक पहुंचना पड़ा। गांव पहुंचकर उन्होंने ग्रामीणों के साथ बैठक की और समस्याओं की जानकारी ली।ग्रामीणों के अनुसार मुख्य सड़क से गांव तक जाने वाला करीब एक किलोमीटर मार्ग पूरी तरह जर्जर है। बरसात में यह सड़क कीचड़ और गड्ढों में तब्दील हो जाती है। वहीं गांव के भीतर करीब तीन किलोमीटर लंबी कच्ची सड़क भी बदहाल स्थिति में है।पेयजल की समस्या लंबे समय से बनी हुई है और स्वास्थ्य सुविधाएं भी नाकाफी हैं। मरीजों को इलाज के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों तक जाना पड़ता है।
शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक है। गांव के दोनों स्कूल जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल भवन कभी भी हादसे का कारण बन सकते हैं। रसोईघर अधूरा है और एक कमरे में ही भोजन बनाने की व्यवस्था की जाती है।
वहीं सुरगुइयां टोला की करीब 400 आबादी के लिए एक भी आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है। पूरे गांव में केवल एक आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहा है। ग्रामीणों ने अलग आंगनबाड़ी केंद्र की मांग उठाई है।
करीब 800 मतदाताओं वाले इस गांव के लोगों का कहना है कि चुनाव के समय नेता वोट मांगने आते हैं, लेकिन गांव की समस्याओं को लेकर कोई गंभीर पहल नहीं होती। ऐसे में पहली बार किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के गांव पहुंचने से ग्रामीणों को विकास की नई उम्मीद जगी है।
बीडीओ ने आश्वासन दिया है कि सड़क, आंगनबाड़ी केंद्र और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर उपायुक्त को भेजी जाएगी, ताकि जल्द विकास कार्य शुरू किए जा सकें।
सोदा गांव की तस्वीर यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि आजादी के 79 साल बाद भी यदि कोई गांव सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है, तो विकास के दावों की जमीनी हकीकत क्या है। फिलहाल ग्रामीणों को उम्मीद है कि बीडीओ का यह दौरा उनके गांव की तकदीर बदलने की शुरुआत साबित होगा।
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