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लोकसभा 54 वोटों से गिर गया महिला आरक्षण बिल

On: April 18, 2026 1:41 PM
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लोकसभा 54 वोटों से गिर गया महिला आरक्षण बिल
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भारत की राजनीति में लगभग तीन दशक से चर्चा का केंद्र रहा महिला आरक्षण बिल एक बार फिर लोकसभा में पारित नहीं हो सका। 17 अप्रैल 2026 को पेश किया गया यह संविधान संशोधन बिल बहुमत के अभाव में गिर गया। जिससे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। यह एक संविधान संशोधन विधेयक था इसलिए इसे पास कराने के लिए साधारण बहुमत नहीं बल्कि दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी।

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इस बिल को पास कराने के लिए कुल 352 वोटों की जरूरत थी। लेकिन पक्ष में केवल 298 वोट पड़े वहीं विपक्ष में 230 वोट पड़े। कोलकसभा में कुल 543 सीटें हैं जिसमें वर्तमान में 540 सांसद और इन सांसदों में से 528 सांसदों ने वोटिंग की। यानी बिल को पास होने के लिए जरूरी संख्या से 54 कम वोट मिले। जिसकी वजह से लोकसभा में ये बिल पास नहीं हो पाया।

महिला आरक्षण बिल जिसे “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” भी कहा जाता है। इस बिल का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना साथ ही एससी और एसटी सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना था। हालांकि इसे लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन को जरूरी माना गया है जिससे चलते इस बिल की लागू होने की प्रक्रिया टलती रही है।

2026 में इस बिल में जो 131वां संशोधन लाया गया था। उसमें महिला आरक्षण को सीधे लागू करने की कोशिश की गई। लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ दिया गया। जिसकी वजह से इस बिल को लेकर विरोध हुआ। विपक्ष का आरोप है कि सरकार सीटों का पुनर्गठन कर राजनीतिक फायदा लेना चाहती है। साथ ही एसी आशंका जताई जा रही थी कि परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं।

महिला आरक्षण बिल का इतिहास लंबा और जटिल रहा है। 1996 में पहली बार इसे संसद में पेश किया गया1998 से 2003 तक इस बिल को कई बार पेश किया गया लेकिन हर बार असफल हाथ लगी। 2008 में भी ये बिल पास नहीं हो सका। वहीं 2010 में राज्यसभा से पास हो गया लेकिन लोकसभा में नहीं लाया गया। 2023 में फिर से 106वां संशोधन कर इसे पास किया गया। लेकिन इसमें एक कैच जोड़ दिया गया और इसे लागू कराने के लिए इसको परिसीमन पर निर्भर कर दिया गया।

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कुल मिलाकर यह बिल करीब 30 साल से संघर्ष कर रहा है और कई बार संसद में गिर चुका है। भारत में अभी भी लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% के आसपास है। जो कि दुनिया के कई देशों की तुलना में यह कम है। राजनीतिक सहमति की कमी और परिसीमन जैसे तकनीकी मुद्दे बार-बार इस बिल के पास होने में बाधा बन रहे हैं।

बातों के जरिए महिलाओं को मजबूत करने की बात हर कोई करता नजर आता है। लेकिन जब इसे धरातल पर लाने की बात होती है तो पार्टियां कोई ना कोई बहाना बनाकर इसके विपक्ष में वोट कर देती हैं। महिलाओं के 50 फीसदी भागीदारी वाले इस देश में उन्हें 33 फीसदी आरक्षण नहीं मिल पा रहा है। पिछले तीन दशकों से महिलाएं इसकी मांग कर रही हैं।

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