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झारखंड में नाबालिग लड़कियों के लापता होने पर राज्यपाल सख्त, हर जिले में समीक्षा के आदेश

On: April 25, 2026 7:08 PM
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झारखंड में नाबालिग लड़कियों के लापता होने पर राज्यपाल सख्त, हर जिले में समीक्षा के आदेश
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झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने नाबालिग लड़कियों के लापता होने की घटनाओं पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने पुलिस को हर जिले में ऐसे मामलों की नियमित समीक्षा करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। राज्यपाल की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब झारखंड समेत देशभर में लड़कियों की गुमशुदगी और मानव तस्करी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

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राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े इस संकट की गंभीरता को उजागर करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में हर साल लगभग 60 हजार से अधिक लड़कियां लापता होती हैं। औसतन हर दिन 150 से 170 के बीच लड़कियां गायब हो जाती हैं। लापता बच्चों में करीब 70 प्रतिशत हिस्सा लड़कियों का होता है। कई मामलों में ये गुमशुदगियां महज घर छोड़ने तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि संगठित तस्करी नेटवर्क से जुड़ी होती हैं।

झारखंड को मानव तस्करी का प्रमुख स्रोत माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार राज्य के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की लड़कियां गरीबी, अशिक्षा और रोजगार की कमी के कारण आसानी से तस्करों के जाल में फंस जाती हैं। उन्हें नौकरी, शादी या बेहतर जीवन का झांसा देकर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और मुंबई जैसे बड़े शहरों में ले जाया जाता है।

मानव तस्करी के मामलों में हर साल हजारों केस दर्ज होते हैं। लेकिन गिरफ्तारी और सजा की दर अपेक्षाकृत कम बनी रहती है। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि कई गिरोह अंतरराज्यीय स्तर पर सक्रिय हैं। जिनका नेटवर्क प्लेसमेंट एजेंसियों और बिचौलियों के जरिए चलता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक मामलों की संख्या दर्ज मामलों से कहीं अधिक है। क्योंकि बड़ी संख्या में घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं हो पातीं।

तस्करी की शिकार लड़कियों का इस्तेमाल केवल देह व्यापार तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसियों और सामाजिक संगठनों की रिपोर्ट बताती हैं कि बड़ी संख्या में लड़कियों को घरेलू कामकाज के लिए “प्लेसमेंट एजेंसियों” के जरिए भेजा जाता है। जहां उन्हें बंधुआ मजदूर जैसी स्थिति में रखा जाता है। इसके अलावा उन्हें फैक्ट्रियों, ईंट-भट्टों और खेतों में जबरन मजदूरी के लिए भी लगाया जाता है। कुछ मामलों में जबरन शादी और दुल्हन खरीद की प्रथा भी सामने आई है। सीमित लेकिन गंभीर मामलों में अंग तस्करी से जुड़ाव की आशंका भी जताई जाती रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या की जड़ में गरीबी, शिक्षा की कमी, रोजगार के सीमित अवसर और कानून के कमजोर क्रियान्वयन जैसे कारक शामिल हैं। राज्यों के बीच समन्वय की कमी और लंबी न्यायिक प्रक्रिया भी तस्करों को बच निकलने का अवसर देती है।

राज्यपाल द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि पुलिस और प्रशासन जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी कार्रवाई कर पाते हैं। लगातार बढ़ते मामलों के बीच यह सवाल अहम हो गया है कि क्या सख्त निगरानी और त्वरित कार्रवाई से इस संगठित अपराध पर लगाम लगाई जा सकेगी या यह संकट यूं ही गहराता रहेगा।

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