झारखंड की पहचान सिर्फ जल, जंगल और जमीन से ही नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत से भी है। इसी विरासत के संरक्षण और संवर्धन को लेकर आज रांची के दीक्षांत मंडप में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा झारखंड की पहचान विषय पर एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड की नौ प्रमुख भाषाओं संथाली, कुड़ुख, मुंडारी, खड़िया, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनिया, खोरठा और हो के संरक्षण, संवर्धन और शिक्षा में उनके उपयोग को लेकर विस्तृत चर्चा की गई। इस अवसर पर भाषा विशेषज्ञ, शोधकर्ता, शिक्षाविद, जनप्रतिनिधि, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़े लोग उपस्थित रहे।

टीवी 45 से बात करते हुए पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि झारखड राज्य का गठन जल, जंगल, जमीन, भाषा, संस्कृति और परंपरा की बुनियाद पर हुआ है। यदि जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण नहीं किया गया तो राज्य की सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ जाएगी। उन्होंने इन भाषाओं के संरक्षण के लिए अलग बजट, स्पष्ट नीति तथा प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक मातृभाषा आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि भाषा से जुड़ी किसी भी नीति या नियम को लागू करने से पहले भाषा विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से व्यापक विमर्श किया जाना चाहिए। साथ ही बताया कि कार्यशाला में हुए पैनल डिस्कशन के सुझावों को एक दस्तावेज के रूप में तैयार कर राज्य सरकार को सौंपा जाएगा।
टीवी 45 से बातचीत में बंधु तिर्की ने परिसीमन के मुद्दे पर कहा कि वे परिसीमन के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जिस प्रक्रिया के तहत वर्तमान में परिसीमन किया जा रहा है, उससे आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि यदि परिसीमन से पहले उनके सुझावों और आवश्यक सुधारों को शामिल किया जाए, तभी यह आदिवासी समाज के हित में होगा। अन्यथा वर्तमान प्रक्रिया से आदिवासी समुदाय को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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