देशभर में आज भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पूरे उत्साह, भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। घरों से लेकर मंदिरों तक विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजनों का सिलसिला जारी है। मथुरा, वृंदावन, काशी, दिल्ली और मुंबई समेत देश के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। भक्त व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर रहे हैं और मध्यरात्रि में कान्हा के जन्म के बाद विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां की जा रही हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के संयोग में अवतार लिया था। इसी मान्यता के चलते जन्माष्टमी की रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान बाल गोपाल का पंचामृत अभिषेक, नए वस्त्रों और आभूषणों से श्रृंगार, झूला सजाने तथा माखन-मिश्री का भोग लगाने की परंपरा है।
जन्माष्टमी पर विशेष पूजा और व्रत का विधान
जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। कई भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु फलाहार के माध्यम से उपवास करते हैं। दिनभर भगवान कृष्ण की भक्ति, भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।
मान्यता है कि मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विधिवत पूजा-अर्चना करने के बाद व्रत खोला जाता है। भक्त बाल गोपाल को झूला झुलाते हैं, उन्हें माखन-मिश्री और अन्य पकवानों का भोग लगाते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की खुशहाली और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं।
मथुरा से लेकर देशभर के मंदिरों में खास तैयारियां
जन्माष्टमी को लेकर भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और वृंदावन में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर विशेष श्रृंगार आरती के साथ ठाकुर जी को 1008 लड्डुओं का भोग अर्पित किया गया। वहीं मध्यरात्रि में होने वाले जन्मोत्सव के लिए पंचामृत अभिषेक और विशेष पूजन की तैयारियां की गई हैं।
अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को लेकर भी श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। निशीथ काल में भगवान लड्डू गोपाल का अभिषेक, श्रृंगार, नए वस्त्र धारण कराने, माखन-मिश्री का भोग और विधिवत पूजन किया जाएगा।
इस्कॉन मंदिरों समेत देश के विभिन्न कृष्ण मंदिरों में मंगला आरती, संकीर्तन और भक्ति कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद वितरण, अन्नदान और धार्मिक पाठ की व्यवस्था भी की गई है। बड़ी संख्या में भक्तों के पहुंचने को देखते हुए मंदिर परिसरों और प्रमुख धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं।
‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ से गूंजेंगे मंदिर
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय मंदिरों में विशेष भजन और संकीर्तन का आयोजन किया जाता है। आधी रात को कान्हा के जन्म के बाद ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ और ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की’ जैसे जयकारों से वातावरण कृष्णमय हो उठता है।
भक्तों का मानना है कि जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ भजन-कीर्तन करने से मन को शांति मिलती है और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
धनबाद में दुल्हन की तरह सजा श्री श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर
झारखंड के धनबाद में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। धनसार स्थित श्री श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर को आकर्षक विद्युत सज्जा और रंग-बिरंगे फूलों से बेहद खूबसूरती से सजाया गया। मंदिर की सजावट ऐसी नजर आई, मानो पूरा परिसर दुल्हन की तरह सजा हो।
मंदिर परिसर में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और उनके जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को प्रतिमाओं और आकर्षक झांकियों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। इन झांकियों को देखने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिर पहुंचती रही।
जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर परिसर में मेले का भी आयोजन किया गया, जहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में खासा उत्साह देखने को मिला। जैसे-जैसे मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का समय नजदीक आता गया, मंदिर परिसर भक्तों के जयकारों से गूंजने लगा।
‘जय कन्हैया लाल की’ और ‘हाथी घोड़ा पालकी’ के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। भक्ति, आस्था और उल्लास के इस संगम ने धनबाद की जन्माष्टमी को खास बना दिया।
जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके जीवन और शिक्षाओं को स्मरण करने का भी अवसर है। देशभर में आज मंदिरों और घरों में उमड़ रही आस्था इस बात की गवाही दे रही है कि कान्हा के प्रति भक्तों की श्रद्धा आज भी उतनी ही गहरी और जीवंत है।
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