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Royalty Policy: दुमका में नई रॉयल्टी व्यवस्था के खिलाफ संवेदकों का विरोध, पुराने टेंडर का भुगतान पुराने नियम से करने की मांग

Royalty Policy: दुमका में नई रॉयल्टी व्यवस्था के खिलाफ संवेदकों का विरोध
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Royalty Policy: झारखंड सरकार की नई रॉयल्टी व्यवस्था को लेकर संथाल परगना के संवेदकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। मंगलवार को दुमका में संथाल परगना के विभिन्न जिलों से पहुंचे संवेदकों ने बैठक कर सरकार की नई व्यवस्था के खिलाफ विरोध जताया। संवेदकों का कहना है कि खनन विभाग की ओर से लागू किए गए नए रॉयल्टी और चालान संबंधी प्रावधानों से निर्माण कार्यों की लागत बढ़ रही है। इसका सीधा असर छोटे-बड़े ठेकेदारों और पंचायत स्तर पर काम करने वाले संवेदकों पर पड़ रहा है।

संवेदकों ने सरकार से मांग की है कि नई रॉयल्टी व्यवस्था को केवल भविष्य में जारी होने वाले नए टेंडरों पर लागू किया जाए। वहीं, पुराने टेंडर और एग्रीमेंट के तहत पहले से चल रहे कार्यों का भुगतान पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार ही किया जाए। उनका कहना है कि पुराने अनुबंधों पर नई व्यवस्था लागू करना संवेदकों के साथ अन्याय है और इससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

Royalty Policy: नई व्यवस्था से छोटे-बड़े सभी संवेदक प्रभावित

संवेदक विवेकानंद राय ने कहा कि सरकार की नई रॉयल्टी व्यवस्था से बड़े, छोटे, मंझले और पंचायत स्तर पर काम करने वाले सभी संवेदक प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि संवेदकों को सरकारी नियमों के अनुसार काम करने के लिए रॉयल्टी चालान की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। खनन विभाग की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि चालान आसानी से मिल सके और निर्माण कार्य बाधित न हो।

उन्होंने सरकार से स्पष्ट मांग की कि नए नियमों को भविष्य के टेंडरों पर लागू किया जाए, जबकि पुराने निविदा और एग्रीमेंट के तहत चल रहे कार्यों का भुगतान पुरानी व्यवस्था के अनुसार किया जाए। उनका कहना है कि पुराने टेंडर की दरें पहले से निर्धारित होती हैं। ऐसे में बीच में नई रॉयल्टी व्यवस्था लागू करने से संवेदकों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।

जीएसटी और रॉयल्टी के बोझ से बढ़ी परेशानी

वहीं, संवेदक आरपी सिंह ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि सरकार नए नियम लागू कर पुराने एग्रीमेंट पर भी उसका आर्थिक बोझ डाल रही है। उन्होंने जीएसटी की दर 12 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत होने का हवाला देते हुए कहा कि अतिरिक्त 6 प्रतिशत का भार संवेदक लंबे समय से अपनी जेब से उठा रहे हैं। ऐसे में नई रॉयल्टी व्यवस्था ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

उन्होंने खनिज की उपलब्धता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सरकारी योजनाओं के अनुपात में स्थानीय स्तर पर पर्याप्त खनिज उपलब्ध नहीं है। इसके कारण निर्माण कार्यों के लिए जरूरी खनिज सामग्री जुटाने, उसकी ढुलाई और रॉयल्टी भुगतान में संवेदकों को अतिरिक्त परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने 37 प्रतिशत डीएमएफटी का अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात भी कही।

निर्माण सामग्री महंगी, कर्ज लेकर काम करने को मजबूर संवेदक

आरपी सिंह ने कहा कि अलकतरा समेत अन्य निर्माण सामग्रियों की कीमतों में काफी वृद्धि हुई है। ऐसे में पुराने दर पर लिए गए टेंडर को पूरा करना संवेदकों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। लागत बढ़ने के बावजूद उन्हें पुराने अनुबंध के अनुसार ही काम करना पड़ रहा है।

उन्होंने बताया कि कई संवेदकों को निर्माण कार्य जारी रखने के लिए बैंकों से कर्ज लेना पड़ रहा है। दूसरी ओर, सरकारी भुगतान में देरी होने से कर्ज पर ब्याज का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। इससे संवेदकों के सामने गंभीर आर्थिक संकट की स्थिति पैदा हो गई है।

Royalty Policy: मांगें नहीं मानी गईं तो भूख हड़ताल और सचिवालय घेराव

बैठक में शामिल संवेदकों ने एक स्वर में मांग की कि नई रॉयल्टी व्यवस्था को नए टेंडरों तक सीमित रखा जाए और पुराने एग्रीमेंट के तहत किए गए कार्यों का भुगतान पुरानी शर्तों के अनुसार किया जाए। उन्होंने सरकार और खनन विभाग से रॉयल्टी चालान की उपलब्धता भी आसान बनाने की मांग की।

संवेदकों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। इसके तहत भूख हड़ताल, सड़क पर प्रदर्शन, उपायुक्त कार्यालय का घेराव और जरूरत पड़ने पर सचिवालय का घेराव भी किया जाएगा।

फिलहाल नई रॉयल्टी व्यवस्था को लेकर संवेदकों का विरोध तेज होता दिख रहा है। अब देखना होगा कि झारखंड सरकार और खनन विभाग संवेदकों की मांगों पर क्या निर्णय लेते हैं और पुराने टेंडर पर काम कर रहे ठेकेदारों को राहत देने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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