मध्य पूर्व में जारी ईरान युद्ध का असर सिर्फ राजनीति और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसका गंभीर प्रभाव वैश्विक जलवायु पर भी पड़ रहा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार इस युद्ध ने बहुत कम समय में भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ा दिया है जिससे पृथ्वी के तापमान में तेजी से वृद्धि का खतरा पैदा हो गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध के पहले 14 दिनों में ही लगभग 50 लाख टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन हुआ। यह मात्रा आइसलैंड जैसे देश के पूरे साल के उत्सर्जन से भी ज्यादा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस भारी उत्सर्जन का मुख्य कारण युद्ध में इस्तेमाल होने वाले लड़ाकू विमान, मिसाइल, ड्रोन और भारी सैन्य उपकरण हैं। एक आधुनिक फाइटर जेट एक ही मिशन में हजारों लीटर ईंधन जलाकर लगभग 14–17 टन CO₂ उत्सर्जित कर सकता है।
इसके अलावा तेल भंडारों और बुनियादी ढांचे पर हमलों से लगी आग, विस्फोट और ईंधन की बर्बादी भी उत्सर्जन को तेजी से बढ़ा रही है। साथ ही युद्ध के कारण हवाई यात्रा के रास्तों में बदलाव से भी अधिक ईंधन खर्च हो रहा है जिससे अतिरिक्त प्रदूषण पैदा हो रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि असली नुकसान अभी बाकी है। युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के दौरान और भी अधिक कार्बन उत्सर्जन होगा जिससे आने वाले समय में जलवायु संकट और गहरा सकता है।
इस स्थिति को देखते हुए वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ दुनिया भर के देशों से अपील कर रहे हैं कि वे रिन्यूएवबल एनर्जी की ओर तेजी से कदम बढ़ाएं। उनका कहना है कि यदि ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम नहीं की गई तो ऐसे संघर्ष भविष्य में जलवायु संकट को और तेज कर देंगे। ईरान युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल मानव जीवन ही नहीं बल्कि पृथ्वी के पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बदलाव ही इस संकट का दीर्घकालिक समाधान माना जा रहा है।
Also Read- शराब और सिगरेट की लत छूटते ही शरीर खुद को रिपेयर कर लेता है, हैरी पॉटर के हीरो के साथ कुछ ऐसा ही हुआ





