आज देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जा रही है वट सावित्री पूजा। भारत की सनातन परंपराओं में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं पवित्र पर्वों में से एक है वट सावित्री पूजा। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए वट सावित्री पूजा करती हैं। इस दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा कर सावित्री और सत्यवान की अमर कथा का स्मरण करती हैं। उत्तर भारत, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई हिस्सों में यह पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

क्यों मनाई जाती है वट सावित्री पूजा?
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। महिलाएं निर्जला या फलाहार व्रत रखकर भगवान विष्णु, माता सावित्री और बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। बरगद के पेड़ को हिंदू धर्म में अमरता, स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। इसकी जड़ें और विशाल स्वरूप जीवन की निरंतरता का संदेश देते हैं। यही कारण है कि वट वृक्ष की पूजा इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
वट सावित्री पूजा के पीछे की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्विनी और पतिव्रता थीं। उन्होंने सत्यवान नामक राजकुमार से विवाह किया। विवाह से पहले ही ऋषियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि सत्यवान की आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। सावित्री ने यह सब जानते हुए भी सत्यवान को ही अपना पति चुना। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु का समय आया उस दिन वह जंगल में लकड़ी काटने गए और अचानक बेहोश होकर गिर पड़े। तभी यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं। उनकी बुद्धिमत्ता, निष्ठा और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी और राज्य वापस मांगा। अंत में उन्होंने संतान का वरदान मांग लिया। तब यमराज को अपना वचन निभाने के लिए सत्यवान को जीवित करना पड़ा।
Also Read- देवघर पुलिस की बड़ी कार्रवाई, 20 किलो से अधिक गांजा बरामद, 6 तस्कर गिरफ्तार




