मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंगलवार को झारखंड मंत्रालय में वन- पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के कार्यों की उच्चस्तरीय समीक्षा करते हुए अधिकारियों को राज्य के सभी वन क्षेत्रों का तकनीकी एवं डिजिटल रिकॉर्ड एक माह के भीतर तैयार करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि राज्य गठन के बाद से अब तक वन क्षेत्रों में हुए सभी परिवर्तनों का वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार किया जाए, ताकि वन संपदा के संरक्षण, विकास और प्रबंधन को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जा सके।

बैठक में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव अबू बकर सिद्दीकी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक-सह-वन बल प्रमुख (PCCF HoFF) संजीव कुमार, पीसीसीएफ (वन्यजीव) एस.आर. नटेश, झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद के सदस्य सचिव राजीव लोचन बक्शी सहित विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि ऐसी डिजिटल व्यवस्था विकसित की जाए, जिससे एक क्लिक पर राज्य के किसी भी वन क्षेत्र की वास्तविक स्थिति, भौगोलिक सीमा, वन आवरण, जैव विविधता, संरचना तथा वर्तमान गतिविधियों की जानकारी उपलब्ध हो सके। इसके लिए वन क्षेत्रों के डिजिटल मैप की लेयरिंग (GIS आधारित मैपिंग) सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड राज्य के गठन के बाद वन क्षेत्रों में व्यापक बदलाव हुए हैं। कई स्थानों पर वन क्षेत्र का विस्तार हुआ है, वहीं इको-टूरिज्म परियोजनाओं, गेस्ट हाउस और अन्य आधारभूत संरचनाओं का विकास भी हुआ है। दूसरी ओर खनन गतिविधियों के विस्तार, वनों की कटाई तथा वन्यजीव अभयारण्यों एवं राष्ट्रीय उद्यानों की सीमाओं में भी परिवर्तन हुए हैं। ऐसे में वन क्षेत्रों का अद्यतन, वैज्ञानिक और डिजिटल दस्तावेज तैयार करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की प्राथमिकता वन संरक्षण के साथ-साथ हरित आवरण का विस्तार करना है। इसके लिए बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाने, स्थानीय जलवायु के अनुरूप पौधों का चयन करने तथा सूखे एवं अनुपयोगी पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई की कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए, ताकि अधिक से अधिक नए पौधे लगाए जा सकें और वन क्षेत्रों का प्राकृतिक विकास सुनिश्चित हो।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को हेलीकॉप्टर अथवा ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से दुर्गम वन क्षेत्रों में बीज प्रसारण (एरियल सीडिंग) की संभावनाओं का अध्ययन कर प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने को भी कहा। उन्होंने मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं पर गंभीरता से ध्यान देने का निर्देश देते हुए कहा कि जंगली हाथियों के हमलों में मृत व्यक्तियों के आश्रितों को अनुग्रह राशि, क्षतिग्रस्त फसलों एवं मकानों के मुआवजे का भुगतान निर्धारित समय सीमा में हर हाल में सुनिश्चित किया जाए।
समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी जिलों के वन प्रमंडल पदाधिकारियों से ऑनलाइन माध्यम से सीधा संवाद स्थापित कर विभिन्न योजनाओं की प्रगति की जानकारी ली। उन्होंने दुमका, जामताड़ा और कोडरमा के वन प्रमंडल पदाधिकारियों से वनाधिकार पट्टा वितरण, काजू एवं बांस सहित अन्य पौधरोपण कार्यक्रमों, इको-टूरिज्म परियोजनाओं तथा विभाग की अन्य प्रमुख योजनाओं की अद्यतन स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही योजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही समस्याओं की जानकारी लेकर उनके शीघ्र समाधान के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वन संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की आजीविका एक-दूसरे से जुड़े विषय हैं। इसलिए विभाग की सभी योजनाओं के क्रियान्वयन में तकनीक, पारदर्शिता और समयबद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए ताकि झारखंड की वन संपदा का संरक्षण करते हुए उसे भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सके।
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